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Vice President C.P. Radhakrishnan hosted a dinner in honour of the Speakers and Presiding Officers of the Commonwealth countries.
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उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने राष्ट्रमंडल देशों के संसदीय अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के सम्मान में भोज आयोजित किया

राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति सी.पी.राधाकृष्‍णन ने आज नई दिल्ली के संविधान सदन में राष्ट्रमंडल देशों के संसदीय अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के सम्मान में भोज आयोजित किया। 14 से 16 जनवरी, 2026 तक भारत में राष्ट्रमंडल संसदों के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के 28वें सम्मेलन के दौरान भोज आयोजित किया गया।

सभापति ने भारत के ऐतिहासिक संसद भवन के संविधान सदन में पीठासीन अधिकारियों और संसदीय अध्‍यक्षों की मेजबानी पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यह भवन साढ़े सात दशकों से अधिक समय से भारत के जीवंत और समृद्ध संसदीय लोकतंत्र का प्रतीक है।

उपराष्ट्रपति राधाकृष्‍णन ने कहा कि यह सम्मेलन राष्ट्रमंडल लोकतंत्रों को एकजुट करने वाले सामूहिक सद्भाव और साझा उद्देश्य की भावना दर्शाता है। उपराष्ट्रपति राधाकृष्‍णन ने भारत की सभ्यतागत विचारधारा से प्रेरित संवाद, सहयोग और पारस्परिक सम्मान द्वारा एक साथ आगे बढ़ने के महत्व पर बल दिया।

संसदीय अध्यक्षों और पीठासीन संवैधानिक अधिकारियों की भूमिका का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति राधाकृष्‍णन ने विचारों की विविधता के बीच शालीनता और गरिमा के साथ बहस, संवाद और चर्चा को सुगम बनाने की साझा और प्राथमिक उत्‍तरदायित्‍व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रमंडल देशों की भौगोलिक स्थिति, संस्कृति और ऐतिहासिक अनुभव भिन्न हैं, फिर भी वे समान संसदीय लोकाचार और लोकतांत्रिक सिद्धांतों एवं मूल्यों के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता से बंधे हैं।

उपराष्ट्रपति राधाकृष्‍णन ने कहा कि पीठासीन अधिकारी विधायिका की गरिमा और लोगों की आकांक्षापूर्ण आवाज के अंतिम संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं, जिन्हें लोकतंत्र के पवित्र सदन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यवस्थित आचरण के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन बनाए रखने का दायित्व सौंपा गया है।

भारत की लोकतांत्रिक विरासत का उल्‍लेख करते हुए उपराष्‍ट्रपति ने भारत को लोकतंत्र की जननी बताया। उन्‍होंने कहा कि भारत राष्ट्रमंडल को केवल ऐतिहासिक संगठन नहीं, बल्कि समान साझेदारों के बीच सहयोग के अहम और भविष्योन्मुखी मंच के तौर पर देखता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि राष्ट्रमंडल संसदीय अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन – सीएसपीओसी जैसे मंच संस्थागत ज्ञान, सर्वोत्तम प्रचलन और अनुभवों को साझा करने के बहुमूल्य अवसर प्रदान करते हैं।

उपराष्ट्रपति राधाकृष्‍णन ने कहा कि इस प्रकार के आदान-प्रदान से विधानमंडलों की स्थिति अनुकूलता, पारदर्शिता और समावेशिता बढ़ाकर उन्हें सुदृढ़ करने में योगदान मिलता है। सहभोजन या सामुदायिक भोजन की परंपरा का उल्‍लेख करते हुए उन्‍होंने समानता, बंधुत्व और नाते को बढ़ावा देने में इसके प्रतीकात्मक महत्व की चर्चा की।

उन्‍होंने संस्कृत प्रार्थना “समस्थ लोकाः सुखिनो भवन्तु” – यानी सभी प्राणी सर्वत्र सुखी और स्वतंत्र हों – का आह्वान करते हुए साझा प्रयासों द्वारा अपने लोगों के कल्याण और समृद्धि के लिए अथक प्रयास करने की राष्ट्रमंडल विधानमंडलों की सामूहिक प्रतिबद्धता की पुष्टि की।

उपराष्ट्रपति राधाकृष्‍णन ने विश्वास व्यक्त किया कि सीएसपीओसी 2026 के दौरान होने वाली चर्चा से राष्ट्रमंडल देशों के बीच संसदीय संबंध, आपसी समझ और सहयोग और भी सुदृढ़ होंगे।

संबोधन के समापन में उन्‍होंने भारत आने वाले गणमान्य अतिथियों को हार्दिक शुभकामनाएं दीं और आशा व्यक्त की कि उनकी भारत यात्रा सफल और स्‍मरणीय रहेगी।

कार्यक्रम में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, केंद्रीय मंत्रीगण, राज्यसभा उपसभापति हरिवंश, अंतर-संसदीय संघ की अध्यक्ष डॉ. तुलिया एकसन, राष्ट्रमंडल संसदीय संघ के अध्यक्ष डॉ. क्रिस्टोफर कलीला, राज्यसभा और लोकसभा के महासचिव और राष्ट्रमंडल के विभिन्न देशों के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों ने भाग लिया।

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