अंतर्राष्ट्रीय

भारत ने अज़रबैजान के बाकू में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन अनुकूलन पर उच्चस्तरीय मंत्रिस्तरीय वार्ता में वक्तव्य दिया

भारत ने अज़रबैजान के बाकू में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन के लिए कॉप29 के उच्चस्तरीय मंत्रिस्तरीय वार्ता के तहत जलवायु परिवर्तन अनुकूलन में एक वक्तव्य दिया। जिसमें कहा गया, “विकासशील देश जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को बड़े पैमाने पर विकसित देशों के भारी उत्सर्जन के कारण भुगत रहे हैं, जिसके कारण विकासशील देशों के रूप में हमारे लिए, हमारे लोगों का जीवन-उनका अस्तित्व-और उनकी आजीविका दांव पर है।”

ग्‍लोबल साउथ के लिए विश्वसनीय जलवायु वित्त तक पहुंच के महत्व पर बात करते हुए, भारत के एक बयान में कहा गया, “कॉप28 वैश्विक स्टॉकटेक निर्णय ने अनुकूलन में भारी अंतर, कार्यान्वयन में अंतराल को पाटने की आवश्यकता पर जोर दिया जो पर्याप्त ध्यान और संसाधनों की कमी से उत्पन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त, कॉप28 में, पेरिस समझौते के पक्षों ने वैश्विक जलवायु लचीलेपन के लिए यूएई फ्रेमवर्क को अपनाया। यह ढांचा विकासशील देशों के अनुकूलन लक्ष्यों को पूरा करने में मदद को विकसित देशों से बढ़े हुए समर्थन और कार्यान्वयन संसाधनों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है। इस बैठक के जरिए पिछले प्रयासों से आगे बढ़कर, विकासशील देशों की अधिक जरूरतों का सम्मान करते हुए देश-संचालित रणनीतियों का समर्थन करना चाहिए।”

वित्तीय संसाधनों के एक महत्वाकांक्षी प्रवाह की तत्काल आवश्यकता को सामने लाते हुए, भारत ने जोर देकर कहा, “2025 के बाद की अवधि के लिए न्‍यू कलेक्टिव क्‍वांटिफाइड गोल (एनसीक्यूजी) को प्राप्‍त करने के लिए अनुदान/रियायती अवधि में एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य होना चाहिए। एक महत्वपूर्ण पहलू जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है, वह है धीमी गति से वितरण, बदलती आवश्यकताओं के अनुकूल होने के लिए लचीलेपन की कमी और कड़े पात्रता मानदंडों के साथ लंबी जटिल स्वीकृति प्रक्रियाएं जो जलवायु वित्त तक पहुंच को कठिन बनाती हैं।”

बयान में कहा गया कि भारत में अनुकूलन वित्तपोषण मुख्य रूप से घरेलू संसाधनों से ग्रहण किया गया है- “हम वर्तमान में अपनी राष्ट्रीय अनुकूलन योजना विकसित कर रहे हैं। पिछले साल यूएनएफसीसीसी को प्रस्तुत हमारे प्रारंभिक अनुकूलन संचार में, हमने रेखांकित किया था कि अनुकूलन पूंजी निर्माण की आवश्यकता लगभग 854.16 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक बढ़ सकती है। स्पष्ट रूप से, अनुकूलन वित्त प्रवाह में यह महत्वपूर्ण वृद्धि आवश्यक है।”

गौरतलब है कि भारत ने विकसित देशों से विकासशील देशों की अनुकूलन वित्त आवश्यकताओं के संबंध में किए गए प्रतिबद्धताओं को पूरा करने का आह्वान किया। इन प्रतिबद्धताओं को पूरा करने से दुनिया भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक हरित, अधिक टिकाऊ और समृद्ध पृथ्‍वी बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकेगी।

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