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NHRC ने ‘शहरी क्षेत्रों में लू और उसके निवारण’ विषय पर पर्यावरण एवं जलवायु कोर समूह की एक बैठक का आयोजन किया

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने नई दिल्ली के मानव अधिकार भवन में ‘शहरी क्षेत्रों में लू और उसके निवारण’ विषय पर पर्यावरण एवं जलवायु संबंधी अपने कोर ग्रुप की एक बैठक हाइब्रिड मोड में आयोजित की। इस बैठक में विभिन्न हितधारकों ने अत्यधिक रुचि दिखाई और इसमें सार्थक भागीदारी रही। बैठक की अध्यक्षता करते हुए अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन ने कहा कि सर्दियों में प्रदूषण और गर्मियों में लू पर लम्‍बे समय से वार्षिक चर्चा होती रही है, लेकिन इन संकटों से मानव जीवन की रक्षा के लिए किए गए निवारण प्रयासों का कोई स्पष्ट प्रभाव नहीं दिखाई दे रहा है। इस बैठक में एनएचआरसी के सदस्य, न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी, विजया भारती सयानी; महासचिव भरत लाल; महानिदेशक (आई) अनुपमा नीलेकर चंद्र; संयुक्त सचिव सैदिंगपुई छकछुआक; कोर ग्रुप के सदस्य, विशेष प्रतिवेदक, विशेष पर्यवेक्षक, भारत सरकार के वरिष्ठ पदाधिकारी और विभिन्न अर्ध-सरकारी संगठनों के अधिकारी, अहमदाबाद और इंदौर के नगर आयुक्त, प्रख्यात कार्य क्षेत्र विशेषज्ञ और सिविल सोसाइटी के सदस्य उपस्थित थे।

न्यायमूर्ति रामासुब्रमणियन ने कहा कि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मानवाधिकारों के विकास में प्रारंभ में नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक अधिकारों पर ध्यान केंद्रित किया गया, जबकि पर्यावरणीय अधिकारों की बहुत हद तक अनदेखी की गई। यद्यपि मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (यूएचडीआर) को 1948 में अपनाया गया था, लेकिन पर्यावरणीय गिरावट और प्रमुख पारिस्थितिक आपदाओं के बारे में बढ़ती जागरूकता के बाद लगभग 1970 के आसपास पर्यावरणीय अधिकारों पर गंभीर चर्चा शुरू हुई।

उन्होंने कहा कि औद्योगिक क्रांति ने जलवायु परिवर्तन और उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली भीषण गर्मी में इतना योगदान दिया है कि इसका वास्तविक प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ने के बाद ही हमें इसका एहसास हुआ। उन्होंने कहा कि यदि आप गांधीवादी अर्थव्यवस्था के बारे में पढ़ें, तो उन्होंने कभी भी पूरे देश के औद्योगीकरण की कल्पना नहीं की थी। उनका मानना ​​था कि प्रत्येक गाँव आत्मनिर्भर होना चाहिए, लेकिन इसके विपरीत हुआ, जिसके परिणामस्वरूप गाँवों से शहरों की ओर पलायन हुआ। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों की रहने योग्य परिस्थितियों का अभाव और शहरों में ‘कंक्रीट के जंगलों’ के विस्तार ने बढ़ते तापमान और भीषण गर्मी से संबंधित चुनौतियों में और भी योगदान दिया है। दशकों से पर्यावरण को हुए नुकसान को ठीक नहीं किया जा सकता है और इसके प्रभाव को कम करने पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। समय को पीछे ले जाना संभव नहीं है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि जल निकायों और वनों का विनाश बढ़ती गर्मी के तनाव का प्राथमिक कारण है। उन्होंने विद्यमन प्राकृतिक इकोसिस्‍टम के सुदृढ़ संरक्षण, जल निकायों के आसपास निर्माण के सख्त नियमन और सतत शहरी विकास पर केंद्रित व्यावहारिक अनुशंसाओं की वकालत की।

राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य, न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी ने कहा कि शहरी विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है। उन्होंने प्रकृति के संरक्षण, हरित क्षेत्रों के विस्तार तथा भावी पीढ़ियों के लिए संसाधनों की सुरक्षा के लिए सामूहिक कार्रवाई का आग्रह किया।

इससे पूर्व, आयोग के महासचिव भरत लाल ने अपने उद्घाटन भाषण में पर्यावरण और जलवायु पर कोर ग्रुप की बैठक के आयोजन की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। उन्होंने लू को पर्यावरण क्षरण और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी एक बढ़ती हुई मानवाधिकार चिंता के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इसका प्रभाव निर्माण श्रमिकों, बाहरी कामगारों, दिहाड़ी श्रमिकों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पर्याप्त आवास या शीतलन सुविधाओं से वंचित लोगों सहित निर्बल समूहों पर अधिक पड़ता है। उन्होंने कहा कि शहरी क्षेत्रों में लू एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है। उन्‍होंने हाल के वर्षों में देश भर में लू से होने वाली मौतों की बढ़ती संख्या पर चिंता व्यक्त की।

इस बात पर बल देते हुए कि जीवन, स्वास्थ्य और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार मानव जाति के अंतर्निहित अधिकार हैं, उन्‍होंने कहा कि एनएचसीआर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से सक्रिय कदम उठाने का आग्रह करता रहा है। उन्होंने कहा कि कई राज्यों और नगर निगमों ने भीषण गर्मी के प्रभाव को कम करने के लिए पहल की है। हालांकि, इसके बावजूद, एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, लू से होने वाली मृत्‍यु की संख्या लगातार बढ़ रही है।

उन्होंने बैठक के तीन विषयगत सत्रों का संक्षिप्त विवरण भी दिया, जिनमें क) लू की समझ और मानवाधिकारों पर उसका प्रभाव; ख) शहरी क्षेत्रों में लू के लिए शासन ढांचा और शहर-स्तरीय प्रतिक्रिया; और ग) शहरी क्षेत्रों में लचीली और समावेशी शीतलन के लिए अधिकार-आधारित उपाय शामिल थे। उन्होंने प्रतिभागियों से लू के प्रभाव को कम करने और विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में लोगों के जीवन और आजीविका को बचाने के लिए अल्पकालिक, मध्यम अवधि और दीर्घकालिक उपाय सुझाने का अनुरोध किया।

बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान के सतत प्रौद्योगिकी केंद्र के प्रोफेसर (सेवानिवृत्त) एन.एच. रविंद्रनाथ ने वार्ड स्तर पर पूर्वानुमान, एआई-आधारित जोखिम मानचित्रण, बेहतर ताप कार्रवाई योजनाओं, समर्पित अधिकारियों और संवेदनशील श्रमिकों की सुरक्षा को शामिल करते हुए लू की व्यापक परिभाषा की मांग की। मौसम विभाग के महानिदेशक डॉ. अखिल श्रीवास्‍तव ने कहा कि जून में कई राज्यों में सामान्य से अधिक लू की आशंका है। उन्‍होंने बहुस्तरीय पूर्वानुमान और चेतावनी प्रणाली की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए स्ट्रीट वेंडर्स और गिग वर्कर्स जैसे संवेदनशील समूहों को सीधे लू चेतावनी और सलाह देने के प्रयासों पर प्रकाश डाला।

एनडीएमए के सलाहकार (नीति एवं योजना तथा सीबीटी) एस. राकेश कुमार ने कहा कि लू की चपेट में आने वाले सभी 23 राज्यों में अब हीट एक्शन प्लान मौजूद हैं। उन्होंने जिला एवं शहर स्तर पर सुदृढ़ योजना, कार्यान्वयन तंत्र का संस्थागतकरण, उन्नत प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, मजबूत रिपोर्टिंग तंत्र और लू से बचाव के लिए समर्पित निधि की वकालत की। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की संयुक्त सचिव जन स्वास्थ्य जी.एस. चित्रा ने कहा कि मंत्रालय सलाह और जलवायु-स्वास्थ्य कार्यक्रमों के माध्यम से स्वास्थ्य क्षेत्र की तैयारियों को मजबूत कर रहा है। साथ ही, उन्‍होंने जलवायु परिवर्तन और लू के बढ़ते स्वास्थ्य प्रभावों से निपटने के लिए समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अपर निदेशक डॉ. आकाश श्रीवास्तव ने चेतावनी दी कि 2035 तक गर्मी से संबंधित स्वास्थ्य जोखिमों में उल्लेखनीय वृद्धि होने का अनुमान है। उन्‍होंने मृत्यु दर को कम करने के लिए व्यापक स्वास्थ्य कार्य योजनाओं, मजबूत निगरानी प्रणालियों, स्वास्थ्य सेवा क्षमता में वृद्धि, चिकित्सा कर्मियों के व्यापक प्रशिक्षण और अस्पतालों की बेहतर तैयारियों की आवश्यकता पर बल दिया। आवसन और शहरी कार्य मंत्रालय के सलाहकार वी.के. चौरसिया ने शीतलन कार्य योजनाओं, जल निकायों के पुनरुद्धार, शहरी हरियाली, ठंडी छतों, टिकाऊ परिवहन और जलवायु-अनुकूल शहरी अवसंरचना के माध्यम से शहरी नियोजन में ताप-प्रतिरोधकता को एकीकृत करने की वकालत की।

सीएसई के सतत भवन एवं वास कार्यक्रम के कार्यक्रम निदेशक रजनीश सरीन ने शहरी गर्मी को कम करने और जलवायु अनुकूलन क्षमता को बेहतर बनाने के लिए श्रमिक-केंद्रित ताप सुरक्षा प्रोटोकॉल, विस्तारित शहर-स्तरीय तापमान वेधशालाओं, वितरित हरित और नीली अवसंरचना तथा प्रदर्शन-आधारित मानकों की आवश्यकता पर बल दिया। राष्ट्रीय वर्षा-आधारित क्षेत्र प्राधिकरण के अपर सचिव डॉ. अनिल कुमार मिश्रा ने भीषण गर्मी से बचने के लिए कार्य घंटों में संशोधन, शहरी हरित क्षेत्रों को ठंडा करने के लिए उपचारित अपशिष्ट जल के उपयोग को बढ़ाने, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देने तथा शहरों में गर्मी कम करने वाली वनस्पति आवरण को बढ़ाने का सुझाव दिया।

क्‍लाइमेट ट्रेंड्स की संस्थापक-निदेशक डॉ. आरती खोसला ने बढ़ती जलवायु और गर्मी जोखिमों से निपटने के लिए गर्मी से निपटने की कार्य योजनाओं के लिए संवेदनशीलता-आधारित प्राथमिकता, किफायती और संरचनात्मक शीतलन समाधानों को बढ़ावा देने, अस्थायी और अनौपचारिक श्रमिकों को गर्मी से संबंधित प्रभावों से बचाने, गर्मी से संबंधित स्वास्थ्य प्रभावों पर डेटा की पारदर्शिता में सुधार करने और मजबूत अंतर-क्षेत्रीय समन्वय और जन जागरूकता की आवश्यकता पर बल दिया। फरीदाबाद स्थित क्षेत्रीय श्रम संस्थान के निदेशक (सुरक्षा) और कार्य विभाग के प्रमुख विमल मीना ने श्रमिक कल्याण के लिए व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता और सामाजिक सुरक्षा संहिता के प्रावधानों पर प्रकाश डाला। उन्होंने संविदात्मक और असंगठित श्रमिकों के लिए समान कार्यस्थल सुरक्षा पर बल दिया और गर्मी के तनाव और लू लगने के शुरुआती लक्षणों और रोकथाम के बारे में अधिक जागरूकता का आह्वान किया।

सीईईडब्ल्यू की अनुसंधान विश्लेषक प्रेरणा ओझा ने जोखिम-आधारित मानचित्रण, तैयारी योजना, संवेदनशील वार्डों के लिए लक्षित उपाय, निगरानी और मूल्यांकन ढांचे, जेंडर-संवेदनशील दृष्टिकोण, स्थानीय वास्तविकताओं पर आधारित गतिशील अद्यतन और ताप प्रतिरोधकता में सुधार के लिए विद्यमान बुनियादी ढांचे के नवीनीकरण के माध्यम से ताप कार्य योजनाओं के विकास पर किए गए अपने कार्यों पर प्रकाश डाला। पर्यावरणविद् सुंदरम वर्मा ने वनों की कटाई के मुद्दे को उठाया और वृक्षारोपण प्रयासों को बढ़ाने का आह्वान किया। इंदौर के नगर आयुक्त क्षितिज सिंघल ने तीव्र शहरीकरण, वित्तीय और मानव संसाधन की कमी और परस्पर विरोधी नागरिक प्राथमिकताओं सहित शहरी स्थानीय निकायों के सामने आने वाली चुनौतियों को रेखांकित किया। साथ ही, संवेदनशील आवासीय क्षेत्रों में सौर-परावर्तक छत कोटिंग जैसे कम लागत वाले उपायों के माध्यम से ताप प्रतिरोधकता में सुधार के लिए इंदौर के प्रयासों को साझा किया।

देहरादून स्थित आईसीएफआरई के उप महानिदेशक डॉ. एच.एस. गिनवाल ने कहा कि गर्मी से राहत पाने के लिए शहरी हरित आवरण बढ़ाना और परावर्तक छतों का उपयोग करना आवश्यक है। उन्होंने प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को सुदृढ़ करने का भी आग्रह किया। ग्लोबल फाउंडेशन फॉर एडवांसमेंट ऑफ एनवायरनमेंट एंड ह्यूमन वेलनेस के विशिष्ट सलाहकार निरंजन देव भारद्वाज ने वार्ड स्तर पर ताप जोखिम मानचित्रण, अति स्थानीय ताप आसूचना, डिजिटल चेतावनी प्रणाली, बाहरी श्रमिकों की सुरक्षा, शहरी नियोजन में ताप सहनशीलता का एकीकरण और लू के लिए समर्पित वित्तीय और संस्थागत तैयारियों के माध्यम से प्रतिक्रियात्मक से पूर्वानुमानित ताप प्रबंधन की ओर बढ़ने की आवश्यकता पर बल दिया।

अहमदाबाद के नगर आयुक्त बंछनिधि पाणि ने अहमदाबाद के अग्रणी हीट एक्शन प्लान पर प्रकाश डाला। उन्‍होंने बताया कि कैसे इसने प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, शहरी हरियाली, ठंडी छतों, छायादार सार्वजनिक स्थानों, सूक्ष्म स्तर पर हीट-रिस्क मैपिंग, श्रमिक सुरक्षा उपायों, जन जागरूकता अभियानों और जलवायु-अनुकूल शहरी नियोजन के माध्यम से गर्मी से होने वाली मृत्‍यु को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चेन्नई के एडवांस्ड इंस्टीट्यूट ऑफ वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन के सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रोमोद कांत ने किफायती स्पेस-कूलिंग उपायों जैसे कि रिफ्लेक्टिव रूफ और पेंट, तत्काल शीतलन लाभ के लिए बड़े पौधों का प्रत्यारोपण और स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों के आसपास छाया क्षेत्र का विस्तार करने के महत्व पर बल दिया। एनआईडीएम की सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रेरणा जोशी ने बाहरी श्रमिकों के लिए गर्मी से सुरक्षा उपायों को कानूनी रूप से लागू करने, कम आय वाले समूहों के लिए निष्क्रिय और ऊर्जा-कुशल शीतलन समाधानों को बढ़ावा देने, हीट वेव अलर्ट की व्यापक उपलब्धता और विकेंद्रीकृत हरित स्थानों और सूक्ष्म वनों के माध्यम से शहरी हरित आवरण मानदंडों के प्रभावी कार्यान्वयन का आह्वान किया।

शिलांग टाइम्स की संपादक पेट्रीसिया मुखिम ने इस बात पर बल दिया कि पर्यावरण कानूनों का कमजोर प्रवर्तन, नदियों, आर्द्रभूमियों और जंगलों का क्षरण एवं प्राकृतिक इकोसिस्‍टम पर अतिक्रमण पूर्वोत्तर में जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता के प्रमुख कारक हैं। उन्होंने जल निकायों, हरित क्षेत्रों और वन आवरण की मजबूत सुरक्षा की मांग की। भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक गौतम तालुकदार ने ताप आकलन में भूमि सतह तापमान को शामिल करने, बड़े प्रतिष्ठानों से निकलने वाले ताप की निगरानी करने, शहरी नीले-हरे क्षेत्रों पर निगरानी रखने के लिए शहर जैव विविधता सूचकांक का उपयोग करने और अनुपयुक्त उपायों से बचने की वकालत की।

सीएसआईआर, एनईईआरआई की वैज्ञानिक-ई डॉ. शालिनी ध्यानी ने शहरी हरित क्षेत्रों के असमान वितरण को दूर करने, पारिस्थितिक गलियारों और आर्द्रभूमि बफरों को बहाल करने, इकोसिस्‍टम-आधारित शहरी नियोजन अपनाने, सुलभ सार्वजनिक हरित क्षेत्रों का विस्तार करने और संवेदनशील श्रमिकों के लिए ताप-संवेदनशील कार्य अनुसूचियों को लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के संयुक्त निदेशक (वन्यजीव) सुनील शर्मा ने भी ताप तनाव को कम करने के लिए चरणबद्ध कार्य शिफ्ट, बेहतर शहरी जीवन स्थितियों, शहरी पार्कों में अधिक निवेश और पर्यावरणीय एवं नियोजन उपायों के सुदृढ़ प्रवर्तन के सुझावों का समर्थन किया। पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन के लिए एनएचआरसी के विशेष मॉनिटर वी.बी. कुमार ने भवन एवं शहरी नियोजन मानदंडों के अनुपालन का ऑडिट, अनिवार्य एवं प्रोत्साहन-आधारित उपायों के माध्यम से हरित अवसंरचना को बढ़ावा देने, विभिन्न ताप-संबंधी योजनाओं को एक ही निगरानी मंच पर एकीकृत करने और लू सूचकांक विकसित करने का आह्वान किया।

इस चर्चा से निकले प्रमुख सुझाव निम्नलिखित थे:

  • जीआईएस, रिमोट सेंसिंग, एआई, भूमि सतह तापमान और सामाजिक संवेदनशीलता संकेतकों का उपयोग करते हुए वार्ड-स्तरीय ताप संवेदनशीलता और गतिशीलता मानचित्र विकसित करें, जो स्थानीय पूर्वानुमान, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और एक समग्र ताप संवेदनशील सूचकांक द्वारा समर्थित हों;
  • समर्पित अधिकारियों, एकीकृत शासन डैशबोर्ड, नियमित निगरानी और अंतर-विभागीय समन्वय के माध्यम से सभी राज्यों, जिलों और शहरों में ताप कार्य योजनाओं और उनके कार्यान्वयन को संस्थागत रूप देना;
  • एक एकीकृत, वैज्ञानिक रूप से मान्य रिपोर्टिंग और डेटा प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से लू से होने वाली मृत्यु और रुग्णता की निगरानी में सुधार करना;
  • व्यावसायिक ताप-सुरक्षा मानकों, सामाजिक सुरक्षा उपायों, सामुदायिक शीतलन केंद्रों, सुलभ सार्वजनिक हरित स्थानों और प्रवासियों, अस्थायी श्रमिकों, महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और विकलांग व्यक्तियों के लिए लक्षित उपायों के माध्यम से निर्बल आबादी की रक्षा;
  • विशिष्‍ट हीटस्ट्रोक प्रबंधन इकाइयों, प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों, आपातकालीन शीतलन उपकरणों, एम्बुलेंस और चिकित्सा एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य पाठ्यक्रमों में हीट-हेल्थ शिक्षा के एकीकरण के माध्यम से हीट-हेल्थ तैयारियों का सुदृढ़ीकरण;
  • ऊष्मा-प्रतिरोधी और जलवायु-संवेदनशील शहरी डिजाइन को अनिवार्य बनाना, जिसमें पैसिव कूलिंग, कूल रूफ, परावर्तक सामग्री, विद्यमान भवनों का रेट्रोफिटिंग, वेंटिलेशन कॉरिडोर और जलवायु-अनुकूल भवन मानक शामिल हैं;
  • शहरी हरित आवरण, देशी वृक्षारोपण, शहरी वन, हरित गलियारे, आर्द्रभूमि बफर बढ़ाकर और नदियों, झीलों, आर्द्रभूमि और अन्य नीली-हरी अवसंरचना को बहाल करके प्रकृति-आधारित समाधानों का विस्तार;
  • वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग और शहरी जल निकायों और जलग्रहण क्षेत्रों के संरक्षण के माध्यम से सतत जल प्रबंधन को बढ़ावा देना;
  • अपशिष्ट ऊष्मा उत्सर्जन का विनियमन, भवनों और आवासीय परिसरों के लिए ऊष्मा-प्रतिरोधक रेटिंग लागू करना और आवधिक अनुपालन ऑडिट के माध्यम से पर्यावरण, भवन और शहरी नियोजन नियमों के प्रवर्तन का सुदृढ़ीकरण;
  • बहुभाषी, सुलभ और समुदाय आधारित प्रचार-प्रसार के माध्यम से जन जागरूकता और जोखिम संचार को मजबूत करना, जिसमें डिजिटल रूप से वंचित आबादी के लिए ध्वनि-आधारित अलर्ट शामिल हैं; और
  • सरकार के सभी स्तरों पर समर्पित निधि और संस्थागत सहायता के साथ, शहर की मास्टर योजनाओं, विकास योजनाओं, नगरपालिका बजट और जलवायु कार्रवाई रणनीतियों में ताप-प्रतिरोध को मुख्यधारा में शामिल करना।

आयोग, केंद्र और राज्य सरकारों को अपनी अनुशंसाओं को अंतिम रूप देने के लिए इन सुझावों पर विचार-विमर्श करेगा।

Editor

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