नीति आयोग ने आज “भारत के खेल उपकरण निर्माण क्षेत्र की निर्यात क्षमता को साकार करना” शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें भारत की विनिर्माण क्षमताओं, वैश्विक बाजार के अवसरों और देश को वैश्विक खेल उपकरण उद्योग में एक प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने के लिए आवश्यक नीतिगत हस्तक्षेपों का व्यापक मूल्यांकन प्रस्तुत किया गया है।
यह रिपोर्ट नीति आयोग के उपाध्यक्ष सुमन बेरी द्वारा, सदस्य डॉ. अरविंद विरमानी, सीईओ निधि छिब्बर, युवा कार्यक्रम और खेल मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों, राज्य सरकारों और उद्योग जगत व खेल विनिर्माण इकोसिस्टम के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में जारी की गई।
‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने और ‘विकसित भारत @2047’ के दृष्टिकोण के अनुरूप, यह रिपोर्ट भारत के खेल उपकरण क्षेत्र की निर्यात क्षमता को अनलॉक करने के लिए एक साक्ष्य-आधारित ढांचा प्रदान करती है। यह क्षेत्र निर्यात-आधारित विनिर्माण विकास और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है, विशेष रूप से एमएसएमई-आधारित क्लस्टर्स के माध्यम से।
रिपोर्ट जारी होने के अवसर पर बोलते हुए, नीति आयोग के उपाध्यक्ष सुमन बेरी ने इस बात पर प्रकाश डाला कि वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में उभरने की भारत की महत्वाकांक्षा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने की उसकी क्षमता से गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बढ़ती वैश्विक मांग और प्रमुख खेल आयोजनों के दशक को देखते हुए खेल उपकरण क्षेत्र इस संबंध में एक ठोस अवसर प्रदान करता है। उन्होंने गुणवत्ता मानकों, नवाचार और वैश्विक संपर्कों को मजबूत करने के महत्व को रेखांकित किया और कहा कि भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए लक्षित नीतिगत समर्थन, क्लस्टर विकास और प्रौद्योगिकी को अपनाना अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।
नीति आयोग के सदस्य डॉ. अरविंद विरमानी ने उल्लेख किया कि हालांकि भारत ने क्रिकेट उपकरण और बॉल स्पोर्ट्स जैसी चुनिंदा श्रेणियों में अपनी मजबूती स्थापित की है, लेकिन कुल वैश्विक निर्यात में इसकी हिस्सेदारी लगभग 0.5% पर सीमित है, जो विविधीकरण और विस्तार के लिए महत्वपूर्ण गुंजाइश का संकेत देती है। उन्होंने प्रमुख कच्चे माल पर शुल्क को तर्कसंगत बनाने, घरेलू आपूर्ति क्षमताओं को मजबूत करने और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण व गुणवत्ता सुधार में सहायता के लिए कॉमन फैसिलिटी सेंटर विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने रेखांकित किया कि एक मजबूत, वैश्विक स्तर पर एकीकृत विनिर्माण इकोसिस्टम बनाने और आगामी वैश्विक खेल आयोजनों से उत्पन्न होने वाले अवसरों का लाभ उठाने के लिए समन्वित नीतिगत कार्रवाई आवश्यक होगी।
नीति आयोग की सीईओ निधि छिब्बर ने इस बात पर जोर दिया कि खेल उपकरण क्षेत्र भारत के विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण—लेकिन अक्सर कम पहचाना जाने वाला—घटक है। उन्होंने रोजगार सृजन, एमएसएमई विकास और निर्यात विस्तार की भारत की प्राथमिकताओं के साथ इसके मजबूत तालमेल पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि लागत प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार, प्रौद्योगिकी को अपनाना और बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करना इस क्षेत्र की पूर्ण क्षमता को अनलॉक करने की कुंजी होगी, जिसे ‘मेक इन इंडिया’ जैसी चल रही पहलों और एमएसएमई के लिए लक्षित समर्थन का सहयोग प्राप्त है।
खेल परिधान, जूते, उपकरण और एक्सेसरीज सहित वैश्विक खेल सामग्री बाजार का मूल्य 2024 में लगभग 700 बिलियन डॉलर था, जिसके 2036 तक 1 ट्रिलियन डॉलर को पार करने का अनुमान है। इस इकोसिस्टम के भीतर, अकेले खेल उपकरण क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 140 बिलियन डॉलर है, जिसकी वैश्विक मांग 2036 तक लगभग 283 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। 2024 में खेल उपकरणों का वैश्विक निर्यात लगभग 52 बिलियन डॉलर आंका गया था, जो खेलों में बढ़ती भागीदारी, पेशेवर खेल लीगों के विस्तार और दुनिया भर में बढ़ती फिटनेस जागरूकता के कारण निरंतर वृद्धि को दर्शाता है।
वैश्विक संदर्भ में भारत का खेल उपकरण विनिर्माण इकोसिस्टम अपेक्षाकृत छोटा है, लेकिन इसमें मजबूत बुनियादी क्षमताएं मौजूद हैं। देश वर्तमान में सालाना लगभग 275 मिलियन डॉलर मूल्य के खेल उपकरणों का निर्यात करता है, जो वैश्विक निर्यात बाजार का लगभग 0.5% है। विनिर्माण गतिविधियां जालंधर (पंजाब) और मेरठ (उत्तर प्रदेश) जैसे स्थापित क्ल्स्टर्स में केंद्रित हैं, जिन्हें निर्यातकों, घरेलू विनिर्माण इकाइयों और हजारों सूक्ष्म उद्यमों के नेटवर्क का समर्थन प्राप्त है।
यह क्षेत्र मुख्य रूप से एमएसएमई द्वारा संचालित है, जिसमें लगभग 90% उत्पादन लघु और सूक्ष्म उद्यमों द्वारा किया जाता है, जो रोजगार सृजन और स्थानीय आर्थिक विकास के लिए इसके महत्व को रेखांकित करता है। भारत का घरेलू खेल सामग्री बाजार लगभग 2.5 बिलियन डॉलर होने का अनुमान है, जिसमें खेल उपकरणों की हिस्सेदारी लगभग 0.5 बिलियन डॉलर है, जो घरेलू उत्पादन और निर्यात दोनों में विस्तार की पर्याप्त गुंजाइश का संकेत देता है।
रिपोर्ट कई संरचनात्मक चुनौतियों की पहचान करती है जो निर्यात को बढ़ाने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की इस क्षेत्र की क्षमता को सीमित करती हैं। चीन और पाकिस्तान जैसे प्रमुख प्रतिस्पर्धियों की तुलना में भारतीय निर्माताओं को अनुमानित 15–20% लागत नुकसान का सामना करना पड़ता है। इसके मुख्य कारकों में शामिल हैं:
वैश्विक खेल उपकरण वैल्यू चेन में भारत की भागीदारी को मजबूत करने के लिए इन बाधाओं को दूर करना आवश्यक होगा।
IV. रणनीतिक रोडमैप और नीतिगत सिफारिशें
यह रिपोर्ट 2036 तक भारत को खेल उपकरणों के एक प्रतिस्पर्धी वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित करने के लिए एक व्यापक रोडमैप प्रस्तावित करती है। इसकी प्रमुख सिफारिशों में शामिल हैं:
यह रोडमैप विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करने, निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने और इकोसिस्टम के विकास को समर्थन देने के लिए 2027 और 2031 के बीच लगभग ₹7,500 करोड़ के समन्वित निवेश की परिकल्पना करता है।
V. निर्यात वृद्धि और रोजगार की संभावना
यदि अनुशंसित उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो ये वैश्विक खेल उपकरण उद्योग में भारत की स्थिति को काफी मजबूत कर सकते हैं। रिपोर्ट का अनुमान है कि भारत का खेल उपकरण निर्यात 2024 के 275 मिलियन डॉलर से बढ़कर 2036 तक लगभग 8.1 बिलियन डॉलर हो सकता है, जिससे वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 0.5% से बढ़कर लगभग 11% हो जाएगी। इस विस्तार से लगभग 54 लाख अतिरिक्त नौकरियां पैदा हो सकती हैं, विशेष रूप से एमएसएमई-आधारित विनिर्माण क्लस्टरों के भीतर।
VI. वैश्विक खेल अवसरों का लाभ उठाना
रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती है कि आगामी दशक के वैश्विक खेल आयोजन—जिसमें 2036 ओलंपिक खेलों की मेजबानी के लिए भारत की प्रस्तावित बोली भी शामिल है—भारतीय निर्माताओं के लिए वैश्विक खरीद नेटवर्क में एकीकृत होने का एक निरंतर अवसर पैदा करते हैं। इन अवसरों का लाभ उठाने से भारत को वैश्विक खेल उपकरण आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी भूमिका मजबूत करने के साथ-साथ दीर्घकालिक विनिर्माण क्षमताएं बनाने में मदद मिल सकती है। यह रिपोर्ट उद्योग, सरकार और व्यापक इकोसिस्टम के 50 से अधिक हितधारकों के साथ परामर्श सहित व्यापक प्राथमिक और माध्यमिक अनुसंधान पर आधारित है।
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