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Union Minister of Jal Shakti C.R. Patil reviewed the drinking water and water resources sectors in Maharashtra.
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केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल ने महाराष्ट्र में पेयजल और जल संसाधन क्षेत्र की समीक्षा की

जल शक्ति मंत्रालय ने महाराष्ट्र के साथ एक उच्‍च स्‍तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की, जिसमें ग्रामीण पेयजल आपूर्ति योजनाओं, जल संसाधनों, सिंचाई अवसंरचना की प्रगति का आकलन किया गया। यह बैठक नई दिल्ली में डीडीडब्ल्यूएस कार्यालय में संपन्‍न हुई।

बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल ने की। इस बैठक में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और सुनेत्रा पवार भी मौजूद रहे।

इस उच्‍च स्‍तरीय समीक्षा बैठक में महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री, राधाकृष्ण विखे पाटिल; जल संसाधन मंत्री (तापी, विदर्भ और कोंकण), गिरीश महाजन; जल आपूर्ति और स्वच्छता मंत्री, गुलाबराव पाटिल; तथा केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्‍ठ अधिकारी भी शामिल हुए, जिनमें जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग के सचिव वी. एल. कांथा राव तथा पेयजल और स्वच्छता विभाग के सचिव, अशोक के.के. मीणा शामिल थे।

बैठक के दौरान, केंद्र सरकार की बड़ी योजनाओं की महाराष्ट्र में कार्यान्वयन की स्थिति की विस्तृत समीक्षा की गई, जिनमें जल जीवन मिशन (जेजेएम), जल संचय से जनभागीदारी और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) शामिल हैं।

केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल ने बैठक को संबोधित करते हुए इस बात पर जोर दिया कि भूजल पुनर्भरण, स्रोतों की स्थिरता और दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जल संचय जन भागीदारी को जनता के नेतृत्व वाले आंदोलन के तौर पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि यद्यपि बांध और नहर जैसी बड़ी अवसंरचनाएँ कमांड क्षेत्रों तक पानी पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन नहर नेटवर्क से दूर स्थित कई गाँवों और खेतों में अभी तक जल संकट बरकरार है। ऐसे क्षेत्रों में छोटे, कम लागत वाले और समुदाय-आधारित पुनर्भरण ढाँचे तुरंत और स्पष्ट लाभ प्रदान कर सकते हैं।

सी. आर. पाटिल ने इस बात पर भी बल दिया कि जल संरक्षण प्रयासों को जल जीवन मिशन के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि टिकाऊ जल स्रोत सुनिश्चित किए बिना केवल पाइपलाइन आधारित अवसंरचना से दीर्घकालिक जल सुरक्षा हासिल नहीं की जा सकती।

वैश्विक आकलनों का उल्लेख करते हुए सी. आर. पाटिल ने कहा कि विश्‍व बैंक के अध्ययन भी सतत जल प्रबंधन और स्रोत सुदृढ़ीकरण के महत्व को रेखांकित करते हैं। उन्होंने कहा कि जल जीवन मिशन के तहत सुरक्षित और भरोसेमंद जल की बेहतर उपलब्धता से आर्थिक नुकसान कम हो सकता है और समुदायों की कठिन परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण के प्रयास न केवल दीर्घकालिक जल उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार और खर्च में कमी लाने में भी योगदान देते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय संगठनों के निष्कर्षों के अनुरूप है।

सी. आर. पाटिल ने कहा कि पानी की बेहतर उपलब्धता के सकारात्मक सामाजिक प्रभावों – विशेषकर महिलाओं पर बोझ कम करने और स्वास्थ्य संबंधी खर्चों को कम करने – की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने जिला प्रशासनों से इन पहलों को मिशन मोड में लागू करने और लगातार निगरानी सुनिश्चित करने का आग्रह किया, साथ ही चेताया कि छोटे स्तर के कार्यों के प्रभाव को कम करके नहीं आँका जाए। उन्होंने जल संरक्षण को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में आगे बढ़ाने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच मजबूत समन्वय की भी आवश्यकता पर जोर दिया।

सी. आर. पाटिल ने पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के अलावा, सिंचाई के लिए जल की उपलब्धता बढ़ाने और “हर घर जल” के साथ “हर खेत पानी” के विज़न को बढ़ावा देने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने राज्यों को विभिन्न योजनाओं को एकीकृत करने और प्रभावी कार्यान्वयन के लिए समग्र प्रस्ताव तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया। ग्रामीण समुदायों, विशेषकर जल-संकट वाले क्षेत्रों से वित्तीय योगदान से जुड़ी चिंताओं पर उन्होंने कहा कि ऐसे संतुलित समाधान आवश्यक हैं जो लोगों को बेहतर अवसंरचना जैसे ठोस लाभ प्रदान करना सुनिश्चित करें।

30 अप्रैल की बैठक में हुई चर्चाओं का उल्लेख करते हुए सी. आर. पाटिल ने कहा कि वित्तीय और तकनीकी पहलुओं का सभी हितधारकों से प्राप्त इनपुट के आधार पर सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि देश में दीर्घकालिक जल सुरक्षा प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास, समन्वित योजना और सामुदायिक भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

महाराष्ट्र के जल तारा मॉडल का उल्लेख करते हुए सी. आर. पाटिल ने कहा कि पत्थरों से भरा एक साधारण रिचार्ज पिट भी प्रति संरचना पर बहुत कम लागत के साथ बड़ी मात्रा में वर्षा जल का जमीन में पुनर्भरण करने में मदद कर सकता है। उन्होंने बताया कि यदि किसी खेत में ऐसे एक-दो संरचनाएँ बनाई जाएँ, तो किसान स्वयं उनके परिणाम देख पाते हैं और स्वेच्छा से इस मॉडल को आगे अपनाने के लिए प्रेरित होते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे विकेन्द्रीकृत जल संरक्षण ढाँचे उन क्षेत्रों में जल जीवन मिशन को भी समर्थन दे सकते हैं, जहाँ पेयजल स्रोतों की स्थिरता एक चुनौती बनी हुई है।

उन्‍होंने बताया कि सितंबर 2024 में शुरू की गई “जल संचय जन भागीदारी” पहल तेज़ी से प्रगति कर रही है और मई 2026 के अंत तक अधिक संख्या में संरचनाएँ तैयार करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

उन्‍होंने मंत्रियों, अधिकारियों, सरकारी कर्मचारियों और कृषि भूमि के मालिक नागरिकों से आग्रह किया कि वे अपनी भूमि पर कम से कम एक जल संरक्षण संरचना अवश्य बनाएं और उसकी रिपोर्ट करें, ताकि यह पहल सही मायनों में एक सामूहिक आंदोलन बन सके। उन्होंने विशेषकर गंभीर, अर्ध-गंभीर और जल-संकटग्रस्त श्रेणी में आने वाले क्षेत्रों में वीबी-जी राम जी, सीएसआर सहायता, सामुदायिक योगदान और स्थानीय सरकारी संसाधनों के समन्‍वय की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

उन्‍होंने कहा कि गाँवों का बहता हुआ वर्षाजल अक्सर नालों, नदियों और अंततः समुद्र में चला जाता है और स्थानीय स्तर पर उसका उपयोग नहीं हो पाता। उन्होंने बताया कि उपयुक्त स्थानों पर रिचार्ज बोर, रिचार्ज कुएँ, फार्म पॉन्ड, पर्कोलेशन संरचनाएँ और छोटे गड्ढे बनाकर इस पानी को वापस जमीन के अंदर पहुँचाया जा सकता है। उन्होंने गुजरात के बनासकांठा क्षेत्र का उदाहरण दिया, जहाँ सामुदायिक भागीदारी और बड़े पैमाने पर बनाए गए रिचार्ज ढाँचों के माध्यम से भूजल स्थिति में सुधार हुआ, सूखे कुएँ फिर से पानी से भर गए और किसानों को प्रत्यक्ष लाभ मिला।

उन्‍होंने कहा कि आने वाले वर्षों में विशेषकर बढ़ती पेयजल, सिंचाई और भूजल संबंधी चुनौतियों को देखते हुए जल संरक्षण के संबंध में केंद्रित कार्रवाई की आवश्यकता होगी। उन्होंने राज्यों और जिलों से आग्रह किया कि जल संचय जन भागीदारी को व्यावहारिक, कम लागत वाली और बड़े पैमाने पर लागू की जा सकने वाली पहल के रूप में प्राथमिकता दें, ताकि वर्षाजल को स्थानीय स्तर पर संरक्षित किया जा सके, भूजल का पुनर्भरण हो और ग्रामीण पेयजल स्रोत टिकाऊ बन सकें।

महाराष्ट्र में जल क्षेत्र की प्रमुख योजनाओं के कार्यान्‍वयन की समीक्षा बैठक को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि चर्चाएँ बहुत उपयोगी और व्यापक रही हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार सभी पहचानी गई कमियों और खामियों को व्यवस्थित रूप से दूर करेगी तथा आगामी बजटीय प्रावधानों के माध्यम से सूखा-प्रभावित क्षेत्रों को और मजबूत समर्थन दिया जाएगा। जन भागीदारी के महत्व पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र बार-बार सूखे की स्थिति का सामना करता है, इसलिए जल संरक्षण को जन आंदोलन बनना चाहिए। उन्होंने जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, स्रोत स्थिरता और भूजल पुनर्भरण से जुड़े चल रहे प्रयासों की सराहना की और दोहराया कि राज्य सरकार का दृष्टिकोण पूरी तरह केंद्र सरकार के उद्देश्यों के अनुरूप है।

मुख्यमंत्री फडणवीस ने जल सुरक्षा के दीर्घकालिक समाधान के रूप में नदी जोड़ने वाली परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रस्तावित परियोजनाओं के पूरा होने से महाराष्ट्र के सूखा-प्रवण क्षेत्रों को काफी लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा कि 2016 से किए गए अध्ययन और तकनीकी तैयारियाँ अब कार्यान्वयन चरण के करीब हैं। उन्होंने इन लंबी अवधि की परियोजनाओं के समय पर क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण समर्थन, बहु-स्रोत वित्तपोषण और अंतर-राज्यीय समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया।

जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग के सचिव वी. एल. कांथा राव ने बैठक का संदर्भ निर्धारित करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) और महाराष्ट्र के विशेष पैकेज के तहत सिंचाई परियोजनाओं के क्रियान्वयन में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। उन्होंने राज्य सरकार से पर्याप्त धन उपलब्ध कराने और लंबित परियोजनाओं को शीघ्र पूरा करने का अनुरोध किया। उन्होंने आश्वासन दिया कि राज्य सरकार की मांग प्राप्त होते ही केंद्रीय सहायता तुरंत जारी कर दी जाएगी। उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र के दीर्घकालिक जल संसाधन नियोजन के तहत विभिन्न सिंचाई परियोजनाओं और अंतर-राज्यीय नदी जोड़ परियोजनाओं का तकनीकी परीक्षण किया जा रहा है।

पेयजल और स्वच्छता विभाग के सचिव अशोक के.के. मीणा ने जल गुणवत्ता, निगरानी और परियोजना क्रियान्वयन से जुड़े प्रमुख परिचालन पहलुओं पर जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि 2024–25 तक जल गुणवत्ता परीक्षण और सुधारात्मक कार्रवाई की गतिविधियाँ सुचारु रूप से चल रही थीं, लेकिन बढ़ती मांग के कारण कुछ क्षेत्रों में परीक्षण की गति धीमी हुई है। उन्होंने कहा कि पीएचईडी के स्तर पर जल गुणवत्ता परीक्षण को तेज़ करने पर विशेष जोर दिया गया है, ताकि नियमित और मजबूत निगरानी सुनिश्चित की जा सके।

सचिव ने संस्थागत तंत्र को मजबूत करने के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में जिला जल एवं स्वच्छता मिशन (डीडब्ल्यूएसएम) की बैठकें हर महीने नियमित रूप से आयोजित की जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि 13 जिलों में दिसंबर के बाद से कोई बैठक आयोजित नहीं हुई है। इस प्रक्रिया में निरंतरता और जवाबदेही सुनिश्चित करने करने के लिए संबंधित जिला कलेक्टरों से संपर्क करने का निर्णय लिया गया।

बुनियादी ढाँचे के विकास के संदर्भ में अशोक के.के. मीणा ने बांध संबंधी परियोजनाओं की समितियों के साथ करीबी तालमेल की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन कार्यों को तीव्र गति से आगे बढ़ाया जाएगा।

महाराष्ट्र के जल आपूर्ति और स्वच्छता विभाग के प्रधान सचिव पराग जैन-नैनुतिया ने जल उपलब्धता, निगरानी प्रणाली और परियोजना क्रियान्वयन से जुड़े प्रमुख पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि जल उपलब्धता की योजना को मजबूती प्रदान करने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं, जिसमें तकनीकी आकलन और जमीनी स्तर पर सत्यापन में सुधार पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि योजनाओं का अधिक प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सके।

प्रौद्योगिकी अपनाने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि मोटर परिचालन और प्रणाली के प्रदर्शन की वास्‍तविक समय में निगरानी को बेहतर बनाने के लिए आईओटी (इंटरनेट ऑफ थिंग्स) आधारित निगरानी प्रणालियाँ लागू की जा रही हैं। इस पहल को भारत सरकार से सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है और इसका क्रियान्वयन पहले ही शुरू हो चुका है, जो स्मार्ट जल प्रबंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

पराग जैन ने बताया कि अधिक संख्या में गाँवों तक पेयजल कवरेज का विस्तार करने के लिए बहु-ग्राम योजनाओं (एमवीएस) को प्राथमिकता दी गई है। उन्होंने कहा कि उन्नत तकनीक का इस्तेमाल करते हुए एक संतुलित और लागत-प्रभावी तरीका बनाए रखने पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है, ताकि अनावश्यक जटिलता बढ़ाए बगैर दबाव निगरानी जैसी आवश्यक प्रणालियों को प्रभावी रूप से एकीकृत किया जाना सुनिश्चित किया जा सके।

कार्यान्वयन के मोर्चे पर उन्होंने बताया कि परियोजना से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रक्रियागत कार्य सफलतापूर्वक पूरे किए जा चुके हैं। शेष कार्यों को समय पर पूरा करने के प्रयास जारी हैं।

महाराष्ट्र में ज़मीनी प्रगति की समीक्षा और कार्यान्वयन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए नगर आयुक्तों, जिला कलेक्टरों, जिला पंचायत सीईओ और जिला वन अधिकारियों के साथ वर्चुअल संवाद आयोजित किया गया।

अर्चना वर्मा, अपर सचिव एवं मिशन निदेशक, राष्ट्रीय जल मिशन ने विशिष्ट सभा को जल संचय जन भागीदारी (जेएसजेबी) पहल के बारे में जानकारी दी। यह पहल भूजल पुनर्भरण के लिए कृत्रिम वर्षाजल संरचनाओं के निर्माण हेतु समुदाय-आधारित सक्रिय प्रयासों को बढ़ावा देती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जल युक्त शिविर जैसी योजनाओं के माध्यम से महाराष्ट्र ने पहले ही इस दिशा में उदाहरण प्रस्तुत किया है। साथ ही उन्होंने इन संरचनाओं को जेएसजेबी पोर्टल पर अपलोड करने का अनुरोध भी किया।

इसके बाद सुमंत नारायण, संयुक्त सचिव,राष्ट्रीय जल मिशन ने एक विस्तृत प्रस्तुति के माध्यम से बताया कि जेएसजेबी का मुख्य उद्देश्य कम लागत वाले जल संरक्षण उपायों को अपनाते हुए अत्यधिक दोहन वाले जल-जिलों को कम गंभीर श्रेणी में लाना है। उन्होंने बताया कि यह रणनीति “3Cs”—सामुदायिक भागीदारी, कम लागत, कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) फ्रेमवर्क पर आधारित है और इसके बाद उन्होंने कार्यान्वयन की रणनीति साझा की। महाराष्ट्र में जेएसजेबी की प्रगति की भी समीक्षा की गई।

कमल किशोर सोन, एएस और एमडी, राष्ट्रीय जल जीवन मिशन ने जल जीवन मिशन 2.0 के विज़न और उद्देश्य के साथ-साथ जल जीवन मिशन के विभिन्न मानकों पर जिला-वार प्रगति के बारे में विस्तृत प्रस्तुति दी।

कमल किशोर सोन ने अपनी प्रस्तुति में एक रणनीतिक रोडमैप प्रस्तुत किया, जिसमें जल जीवन मिशन के तहत संपत्ति निर्माण से आगे बढ़कर जल जीवन मिशन 2.0 के अंतर्गत दीर्घकालिक और टिकाऊ सेवा वितरण की ओर बदलाव पर जोर दिया गया। यह नया दृष्टिकोण मौजूदा जल योजनाओं की स्थायी कार्यक्षमता सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार पर ध्‍यान केंद्रित करता है। इसका मुख्य विज़न ग्राम पंचायतों (जीपी) और ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों (वीडब्ल्यूएससी) को स्वतंत्र माइक्रो-यूटिलिटीज के रूप में विकसित करना है।

मिशन निदेशक ने संरचनात्मक और डिजिटल गवर्नेंस से जुड़ी गंभीर कमियों को चिन्हित किया, जिन पर जिला कलेक्टरों और राज्य जल एवं स्वच्छता मिशन (एसडब्ल्यूएसएम) द्वारा तत्काल सुधार की कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में सार्वजनिक संस्थानों और जनजातीय बस्तियों में 100% कवरेज देने, तृतीय-पक्ष निरीक्षण एजेंसी के निरीक्षण बढ़ाने, तथा गांव की योजनाओं को औपचारिक तौर पर शुरू करने और सौंपने में तेज़ी लाने को तुरंत प्राथमिकता देने की मांग की गई।

केंद्रित कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए राज्य भर के विभिन्न प्रशासनिक प्रमुखों के लिए लक्ष्य-आधारित जिम्मेदारियाँ तय की गईं। जिला मजिस्ट्रेटों, कलेक्टरों और जिला परिषद के सीईओ को सभी सरकारी भवनों में वैज्ञानिक, समुदाय-आधारित वर्षा जल संचयन और जल पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण करने के लिए वीबी- जी राम जी तथा कॉरपोरेट सीएसआर निधियों को मिलाकर लिए स्थानीय संसाधनों को तेज़ी से जुटाने का काम सौंपा गया।

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