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उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने आज तेलंगाना के सिकंदराबाद परेड ग्राउंड में आयोजित 79वें हैदराबाद मुक्ति दिवस समारोह में मुख्य अतिथि की भूमिका निभाई

उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने आज तेलंगाना के सिकंदराबाद परेड ग्राउंड में आयोजित 79वें हैदराबाद मुक्ति दिवस समारोह में मुख्य अतिथि की भूमिका निभाई।

उपराष्ट्रपति ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि 17 सितंबर 1948 को स्वतंत्र भारत के इतिहास के एक निर्णायक अध्याय पूरा हुआ। इससे सितंबर 1948 की घटनाओं और ऑपरेशन पोलो के बाद तत्कालीन हैदराबाद राज्य का भारतीय संघ में विलय हुआ। उन्होंने कहा कि हैदराबाद मुक्ति दिवस केवल एक ऐतिहासिक तिथि का स्मरणोत्सव नहीं है, बल्कि राष्ट्र निर्माण की यात्रा और उन मूल्यों की याद दिलाता है जो भारत को एकजुट रखते हैं।

उन्होंने कहा कि हैदराबाद की कहानी एक युवा राष्ट्र के सामने आई विशाल चुनौतियों को दर्शाती है। विभिन्न राजनीतिक परिस्थितियों से उभरे लोगों को एक साथ लाने का प्रयास किया गया। यह दूरदर्शिता, साहस और बलिदान की कहानी थी। इसके बाद एक संवैधानिक लोकतंत्र के निर्माण का व्यापक और निरंतर कार्य प्रत्येक नागरिक का समान स्थान सुनिश्चित करने का रहा।

राष्ट्रीय एकता में सरदार वल्लभभाई पटेल के योगदान को याद करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि पहले गृह मंत्री और राज्य मंत्री के रूप में सरदार पटेल ने असाधारण जिम्मेदारी निभाई। विशेष रूप से उस समय जब देश विभाजन की त्रासदी से उबर रहा था और साथ ही सैकड़ों रियासतों का विलय भारत में कर रहा था। सीपी राधाकृष्णन ने कहा, “सरदार पटेल जी ने एक मजबूत, एकीकृत एक भारत की मजबूत नींव रखी।”

भारत के राष्ट्र निर्माण के विभिन्न चरणों की तुलना करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा, “गांधी जी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी ने भारत की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सरदार पटेल जी ने रियासतों को आधुनिक भारत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी जी अब विकसित भारत – 2047 तक के विकसित भारत- के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।”

हैदराबाद संघर्ष के पीछे जन आंदोलन को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए सीपी राधाकृष्णन ने कहा कि छात्रों, बुद्धिजीवियों, लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, किसानों और आम नागरिकों ने इस संघर्ष में भाग लिया और कारावास, हिंसा और भारी व्यक्तिगत कठिनाइयों का सामना किया।

उन्होंने रामजी गोंड, तुरेबाज खान और कोमाराम भीम सहित कई अन्य देशभक्तों को श्रद्धांजलि दी और कहा कि उनका साहस हमें याद दिलाता है कि इतिहास केवल सरकारी दफ्तरों या प्रसिद्ध राजनेताओं द्वारा ही नहीं, बल्कि अन्याय को अपना भाग्य मानने से इनकार करने वाले उन आम नागरिकों द्वारा भी रचा जाता है।

उन्होंने कहा, “राजनीतिक एकीकरण क्षेत्रों को एकजुट कर सकता है; संवैधानिक लोकतंत्र नागरिकों को एकजुट करता है।” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय एकता केवल भूगोल के बल पर कायम नहीं रह सकती, बल्कि समान अधिकारों, समान गरिमा और समान अवसरों के माध्यम से इसे मजबूत किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत की एकता के लिए हर नागरिक का एक जैसा होना आवश्यक नहीं है, क्योंकि भारतीय अलग-अलग भाषाएं बोल सकते हैं, अलग-अलग परंपराओं का पालन कर सकते हैं, अलग-अलग पूजा-पाठ कर सकते हैं और अलग-अलग राजनीतिक विचार रख सकते हैं, फिर भी वे संविधान और इस सिद्धांत से बंधे रहते हैं कि संप्रभुता अंततः जनता की है।

केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की भूमिका का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने रियासतों के एकीकरण और 1947-48 में भारत की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने तेलंगाना, छत्तीसगढ़, झारखंड और अन्य प्रभावित क्षेत्रों में वामपंथी उग्रवाद से निपटने में उनके योगदान को भी स्वीकार किया।

उपराष्ट्रपति ने युद्ध स्मारक का दौरा किया और वीर योद्धाओं को श्रद्धांजलि देते हुए पुष्पांजलि अर्पित की।

उन्होंने परेड का निरीक्षण किया और कार्यक्रम में प्रभावशाली मार्च पास्ट और भावपूर्ण सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को देखा। उन्होंने कहा कि हैदराबाद की विरासत देश को यह याद दिलाती रहनी चाहिए कि एकीकरण से समावेशन संभव है और देशभक्ति का सर्वोच्च स्वरूप अंततः राष्ट्र की सेवा में ही प्रकट होना चाहिए।

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