केंद्र सरकार ने दक्षिणी हिंद महासागर मत्स्य पालन समझौते (एस.आई.ओ.एफ़.ए ) में भारत के प्रवेश को स्वीकृति दे दी है। यह वैश्विक मत्स्य पालन शासन में भारत की स्थिति को मजबूत करने वाले एक रणनीतिक उपलब्धि का प्रतिनिधित्व करता है। भारत सरकार द्वारा दिसंबर, 2025 में जारी खुले समुद्री मत्स्य पालन के दिशानिर्देशों के बाद, यह पहल भारत के मछली पकड़ने वाले बेड़े को अंतर्राष्ट्रीय जल क्षेत्र में विस्तार करने के लिए एक क्षेत्रीय ढांचा प्रदान करेगी। परिणामस्वरूप, भारत अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करने, आर्थिक अवसरों को व्यापक बनाने और एस.आई.ओ.एफ़.ए ढांचे के अंतर्गत उच्च मूल्य वाले समुद्री संसाधनों के सतत निष्कर्षण के लिए वैध अधिकार स्थापित करने के लिए स्थित होगा। इसके अलावा, यह खुले समुद्रों पर मान्यता प्राप्त उपस्थिति की पुष्टि करता है और राष्ट्रीय आर्थिक, वैज्ञानिक और रणनीतिक प्राथमिकताओं के अनुरूप भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाता है।
एस.आई.ओ.एफ़.ए में भारत के प्रवेश के साथ, भारतीय ध्वज वाले मछली पकड़ने वाले पोत और उद्यम एस.आई.ओ.एफ़.ए के अधिकार क्षेत्र के भीतर स्क्विड, टूथफ़िश, अल्फोंसो और अन्य गैर-प्रवासी मछली भंडारों का अधिकृत मछली पकड़ने का काम कर सकेंगे।
एस.आई.ओ.ए.एफ में प्रवेश से भारत को अन्य सहयोगी पक्षों के साथ समझौता करने में और आगे मदद मिलेगी ताकि समझौते के उद्देश्यों, अर्थात खुले समुद्र के संसाधनों की वैज्ञानिक समझ और सतत कटाई, समझौते के तहत शामिल संसाधनों के वैज्ञानिक आकलन में भागीदारी और समझौते के तहत अवैध, अनिर्दिष्ट और अनियंत्रित मछली पकड़ने, अप्रलेखित और अनियमित (आई.यू.यू) मछली पकड़ने को रोकने में सहयोग किया जा सके।
इस समझौते से भारत की रणनीतिक क्षेत्रीय प्राथमिकताओं में भी प्रगति होगी और खुले समुद्र बोर्डिंग और निरीक्षण (एच.एस.बी.आई.) योजना में सक्रिय भागीदारी के माध्यम से राष्ट्रीय तटीय सुरक्षा को मजबूत किया जाएगा, जिसे एस.आई.ओ.एफ़.ए के तहत अपनाया गया है और इसे लागू किया जाना है।
वर्तमान में, एस.आई.ओ.एफ़.ए के लिए एक सहयोगी गैर-अनुबंधित पक्ष (सी.एन.सी.पी) के रूप में भारत, निर्णय लेने में सीमित भागीदारी रखता है, जिसमें वैज्ञानिक समिति और अनुपालन समिति जैसे प्रमुख निकाय शामिल हैं। बिना अनुबंध के पक्ष के रूप में अभिगम करने से भारत इन निकायों में पूरी तरह से भाग ले सकेगा और वैज्ञानिक डेटा, अनुसंधान कार्यक्रमों और भंडार आकलन तक पहुँच प्रदान कर सकेगा। इससे भारतीय मछुआरों और उद्यमियों को नई मछली पकड़ने के अवसर प्राप्त होंगे। एस.आई.ओ.ए क्षेत्र में टिकाऊ मछली पकड़ने की प्रथाओं में भारत का सक्रिय योगदान समुद्री संसाधनों को संरक्षित करने, उनकी दीर्घकालिक व्यवहार्यता सुनिश्चित करने और भारतीय मछली पकड़ने वाले समुदायों की आजीविका में सहयोग करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
पृष्ठभूमिः
खुला समुद्र वैश्विक महासागर का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा है और वर्तमान में पांच देशों/क्षेत्रों द्वारा नियंत्रित हैंः चीन (21 प्रतिशत), ताइवान (13 प्रतिशत), जापान (11 प्रतिशत), दक्षिण कोरिया (11 प्रतिशत) और स्पेन (8 प्रतिशत)। हिंद महासागर में दो प्रमुख क्षेत्रीय मत्स्य पालन प्रबंधन संगठन (आर.एफ़.एम.ओ) हैं, अर्थात् हिंद महासागर टूना कमीशन (आई.ओ.टी.सी) और दक्षिणी हिंद महासागर मत्स्य पालन समझौता (एस.आई.ओ.एफ़.ए.)। भारत 1996 से आई.ओ.टी.सी. का एक अनुबंधी पक्ष रहा है, जो अत्यधिक प्रवासी टूना और टूना जैसी प्रजातियों को नियंत्रित करता है।
भारत 2022 से एस.आई.ओ.एफ़.ए का सहयोगी गैर-अनुबंधित पक्ष (सी.एन.सी.पी) रहा है। इस सदस्यता के साथ, भारत वैध मछली पकड़ने के अधिकार, एस.आई.ओ.ए के क्षेत्र में उच्च समुद्रों में समुद्री संसाधनों तक पहुँच और मौजूदा वैश्विक बेड़ियों के साथ एक मान्यता प्राप्त उपस्थिति स्थापित करने का अवसर प्राप्त करता है। यह समझौता क्षेत्र के भीतर मछली, मोलस्क, क्रैस्टेशियन और अन्य स्थलीय प्रजातियों सहित मत्स्य संसाधनों को शामिल करता है, लेकिन अत्यधिक प्रवासी प्रजातियों (यू.एन.सी.एल.ओ.एस. का अनुलग्नक I) और तटीय राज्यों के मत्स्य अधिकार क्षेत्र के अधीनस्थ स्थलीय प्रजातियों (यू.एन.सी.एल.ओ.एस. का अनुच्छेद 77(4)) को बाहर रखता है। भारतीय मछली पकड़ने वाले जहाज वर्तमान में ई.ई.ज़ेड के 60-80 एन.एम के भीतर काम करते हैं और भारत को अपने मछली पकड़ने की क्षमता को सभी संभावित खुले समुद्र क्षेत्रों में विकसित और विस्तारित करने की आवश्यकता है, जिसमें अन्य देशों के ई.ई.ज़ेड. में अभिगम समझौतों के माध्यम से शामिल है, जिससे राष्ट्रीय खजाने में योगदान होता है।
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