दिव्यांगजनों की प्रतिभा, उपलब्धियों और आकांक्षाओं का जश्न मनाने के लिए आज राष्ट्रपति भवन में ‘पर्पल फेस्ट’ का आयोजन किया गया। दिन भर चले इस उत्सव में 8,000 से अधिक दिव्यांगजनों ने अमृत उद्यान का दौरा किया, जो आज खास तौर पर उनके लिए खोला गया था। उन्होंने दिव्यांगजनों के लिए काम करने वाले विभिन्न संगठनों द्वारा लगाए गए स्टालों के ज़रिए कई मनोरंजक खेलों और सीखने की गतिविधियों में भी भाग लिया।
शाम को, भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने समारोह में शिरकत की और राष्ट्रपति भवन के खुले रंगमंच में दिव्यांगजनों द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद लिया।
इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि किसी भी देश या समाज की पहचान केवल उसके विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों के लिए हासिल की गई कामयाबियों से नहीं, बल्कि हाशिए पर रहने वाले लोगों के प्रति उसकी संवेदनशीलता से होती है। अगर हम भारतीय इतिहास पर नजर डालें, तो दखेंगे कि संवेदनशीलता, समावेशिता और सद्भाव में विश्वास हमारी संस्कृति और सभ्यता के मूल तत्व रहे हैं। भारत का संविधान हमें आदर्श सामाजिक मानक प्रदान करता है। हमारे संविधान की प्रस्तावना सामाजिक न्याय, सामाजिक समानता और व्यक्ति की गरिमा के आदर्शों को स्थापित करती है। राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत दिव्यांगजनों को शिक्षा, कार्य और सार्वजनिक सहायता का अधिकार प्रदान करते हैं।
राष्ट्रपति ने कहा कि समावेशी समाज के निर्माण के लिए दिव्यांगजनों का सशक्तिकरण बेहद ज़रुरी है। हालांकि, यह केवल सरकार की कोशिशों से संभव नहीं है। इसके लिए समाज के हर व्यक्ति और संस्था की सक्रिय भागीदारी ज़रुरी है।
राष्ट्रपति ने कहा कि हम वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के सामूहिक लक्ष्य की ओर तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं और दिव्यांगजन इस यात्रा में समान भागीदार हैं। समाज के हर सदस्य का यह फर्ज़ है कि उन्हें समान अवसर और सम्मान के साथ प्रगति करने का अवसर दिया जाए।
राष्ट्रपति ने कहा कि दिव्यांगजनों को आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उन्हें इस यात्रा में सरकार और समाज का पूरा सहयोग मिलेगा। उन्होंने कहा कि दिव्यांगजनों का समर्पण, मेहनत और लगन न केवल उनके लिए सफलता का मार्ग प्रशस्त करेगी, बल्कि बाकी नागरिकों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनेगी।
भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा आयोजित ‘पर्पल फेस्ट’ का मकसद विभिन्न प्रकार की शारीरिक बाधाओं और उनके लोगों के जीवन पर पड़ने वाले असर के बारे में जागरूकता बढ़ाना और समाज में दिव्यांगजनों के प्रति समझ, स्वीकृति और समावेश को बढ़ावा देना है।
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