चंपारण सत्याग्रह की आज 108वीं वर्षगांठ है, महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश के स्वतंत्रता संग्राम का यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था। 1917 में इसी दिन बिहार के चंपारण जिले में नील किसानों की शिकायतों को दूर करने के लिए आंदोलन शुरू किया गया था, ब्रिटिश बागान मालिकों द्वारा दमनकारी तिनकठिया प्रणाली के तहत किसानों को नील की खेती करने के लिए मजबूर किया गया था। यह देश में महात्मा गांधी का सत्याग्रह का पहला प्रयोग भी था।
स्थानीय किसान राजकुमार शुक्ल के लगातार आग्रह पर महात्मा गांधी चंपारण पहुंचे और किसानों की उसे समय की स्थिति की विस्तार से पड़ताल की। तत्कालीन ब्रिटिश शासन ने महात्मा गांधी से इलाके को तत्काल छोड़ने को कहा लेकिन उन्होंने इस आदेश को नहीं माना और अहिंसक आंदोलन के माध्यम से किसानों को संगठित किया और उनकी समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया। इस आंदोलन के परिणाम स्वरुप एक जांच समिति का गठन हुआ गांधी जी को भी इस समिति का सदस्य बनाया गया। यह आंदोलन सफल रहा और वर्ष 1918 में जबरन नील की खेती की प्रथा समाप्त कर दी गई। चंपारण सत्याग्रह ने न केवल किसानों को न्याय दिलाया बल्कि गांधी जी को एक जन नेता के रूप में स्थापित किया और भारत के व्यापक स्वतंत्रता आंदोलन की नींव रखी।
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