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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने गैर-अल्कोहलिक फैटी लिवर रोग (NAFLD) के उपचार संबंधी संशोधित परिचालन और प्रशिक्षण दिशानिर्देश जारी किए

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने आज यहां गैर-अल्कोहलिक फैटी लिवर रोग (एनएएफएलडी) के उपचार संबंधी संशोधित परिचालन दिशानिर्देश और प्रशिक्षण मॉड्यूल जारी किए। ये दस्तावेज जानकारी, प्रमाण आधारित विधियों से एनएएफएलडी रोगियों की देखभाल और नतीजों को बेहतर बनाने के लिए तैयार किए गए हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव अपूर्व चंद्रा ने सत्र को संबोधित करते हुए कहा, “भारत ने एनएएफएलडी को एक प्रमुख गैर संचारी रोग (एनसीडी) के रूप में मान्यता देने में अग्रणी भूमिका निभाई है।” उन्होंने कहा कि यह देश की आबादी में बहुत तेजी से एक प्रमुख स्वास्थ्य चिंता के रूप में उभर रहा है, जो चयापचय (मेटाबोलिक) विकारों जैसे मोटापे, मधुमेह और दिल की बीमारियों से निकटता से जुड़ा है। इस रोग की गंभीरता का पता इस बात से चलता है कि प्रत्येक 10 में से एक से तीन लोगों को एनएएफएलडी हो सकता है।

अपूर्व चंद्रा ने इस बात पर प्रकाश डाला कि संशोधित परिचालन दिशा-निर्देश और प्रशिक्षण मॉड्यूल जारी करना इस रोग पर अंकुश लगाने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा रोग से निपटने के महत्व को दर्शाता है।” उन्होंने कहा कि ये दस्तावेज सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से लेकर चिकित्सा अधिकारियों तक सभी स्तरों पर एक रूपरेखा प्रदान करेंगे। उन्होंने उन लोगों की निरंतर देखभाल पर भी जोर दिया, जिनमें इस रोग का पता चला था और इसके प्रसार को कम करने के लिए जीवनशैली में बदलाव लाने की बात भी कही।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की विशेष कार्य अधिकारी पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने इस मौके पर कहा, “इन दिशा-निर्देशों को जमीनी स्तर कार्य कर रहे स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं तक पहुंचाने की आवश्यकता है ताकि बीमारी का जल्द पता लगाकर इसके बोझ को कम किया जा सके।” उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण मॉड्यूल को जारी किया जाना देश में एनसीडी के बढ़ते बोझ से निपटने के लिए चिकित्सकों की क्षमता निर्माण के देश के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण अतिरिक्त कड़ी है।

इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (आईएलबीएस) के निदेशक डॉ. एस.के. सरीन ने कहा कि दोनों दस्तावेजों का जारी किया जाना लिवर संबंधी बीमारियों की रोकथाम में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसके परिणाम अगले कुछ वर्षों में दिखाई देंगे। उन्होंने लीवर को स्वस्थ बनाए रखने के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर जैसी कई गैर-संचारी बीमारियां (एनसीडी) लीवर के स्वास्थ्य से जुड़ी हैं।

देश में 66 प्रतिशत से ज़्यादा मौतें गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के कारण होती हैं। इन रोगों का तम्बाकू सेवन (धूम्रपान और धूम्रपान रहित), शराब पीना, खराब आहार संबंधी आदतें, अपर्याप्त शारीरिक गतिविधि और वायु प्रदूषण के साथ गहरा संबंध है।

एनएएफएलडी भारत में लिवर रोग का एक महत्वपूर्ण कारण बनकर उभर रहा है। यह एक छिपी महामारी हो सकती है, जिसका सामुदायिक प्रसार 9 प्रतिशत से 32 प्रतिशत तक हो सकता है और आयु, लिंग, रहन-सहन संबंधी स्थितियां तथा सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि 10 में से 1 से 3 व्यक्ति फैटी लिवर या इससे संबंधित बीमारी से पीड़ित होंगे।

भारत में वैश्विक स्तर पर एनसीडी रोगियों की संख्या सबसे ज़्यादा है और मेटाबॉलिक बीमारियों का एक मुख्य कारण लिवर की कार्य प्रणाली से जुड़ा है। इस पर आने वाले खर्च के बढ़ते बोझ और इससे निपटने की आवश्यकता को देखते हुए, भारत 2021 में एनसीडी की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम में एनएएफएलडी को शामिल करने वाला पहला देश बन गया है।

एनएएफएलडी के क्षेत्र में हाल ही में प्रमाण-आधारित समाधानों को देखते हुए, देश में एनएएफएलडी के नियंत्रण और इसकी रोकथाम में चिकित्सा पेशेवरों की मदद करने और उनका बेहतर तरीके से प्रबंधन करने के लिए अद्यतन दिशानिर्देशों की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही थी।

ये दिशानिर्देश बेहतर स्वास्थ्य स्थितियों और इस रोग की शुरू में ही पहचान पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जो एनएएफएलडी मरीजों की समय पर उचित देखभाल को सुनिश्चित करने की दिशा में अहम हैं। ये दिशानिर्देश बहु-विषयक दृष्टिकोण पर जोर देते हैं, जो एनएएफएलडी से प्रभावित व्यक्ति को पूर्ण उपचार प्रदान करने, बेहतर देखभाल करने संबंधी विभिन्न मुद्दों पर स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के प्रयासों को एकीकृत करता है।

एनएएफएलडी के प्रभावी प्रबंधन के लिए न केवल रोग की स्थिति की अच्छी समझ जरूरी है बल्कि स्वास्थ्य सेवा के सभी स्तरों पर साक्ष्य-आधारित कार्यक्रमों को लागू करने की क्षमता भी होनी चाहिए। एनएएफएलडी के लिए प्रशिक्षण मॉड्यूल परिचालन दिशानिर्देशों को पूरक के रूप में विकसित किया गया है और विशेष रूप से प्राथमिक स्तर पर एनएएफएलडी की पहचान, प्रबंधन, रोकथाम के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल के साथ स्वास्थ्य पेशेवरों की क्षमता निर्माण में मदद करता है। मॉड्यूल में महामारी विज्ञान, जोखिम कारक, स्क्रीनिंग, नैदानिक ​​प्रोटोकॉल और मानकीकृत उपचार दिशानिर्देशों सहित विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है। यह स्वास्थ्य परिणामों को बेहतर बनाने के लिए प्रारंभिक पहचान, रोगी शिक्षा, जीवन शैली में बदलाव और एकीकृत देखभाल नीतियों पर भी जोर देता है।

इस बैठक में स्वास्थ्य मंत्रालय के अपर सचिव और वित्तीय सलाहकार जयदीप कुमार मिश्रा, अपर सचिव एल एस चांगसन, संयुक्त सचिव लता गणपति और मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे। इस कार्यक्रम में सभी 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि, विकास साझेदार और विश्व स्वास्थ्य संगठन, आईएलबीएस, एम्स, सीएमसी वेल्लोर, जेआईपीएमईआर, एसजीपीजीआईएमएस, पीजीआईएमईआर और आरएमएल अस्पताल के विशेषज्ञ भी वर्चुअल माध्यम से शामिल हुए।

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