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WHO ने CCRAS-NIIMH, हैदराबाद को पारंपरिक चिकित्सा अनुसंधान के लिए सहयोगी केन्‍द्र के रूप में नामित किया

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO ने CCRAS-NIIMH, हैदराबाद को पारंपरिक चिकित्सा अनुसंधान के लिए सहयोगी केन्‍द्र के रूप में नामित किया) ने आयुष मंत्रालय की केन्‍द्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस) के तहत एक इकाई, राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा विरासत संस्थान (एनआईआईएमएच), हैदराबाद को “पारंपरिक चिकित्सा में मौलिक और साहित्यिक अनुसंधान” (सीसी आईएनडी-177) के लिए डब्‍ल्‍यूएचओ सहयोगी केन्‍द्र (सीसी) के रूप में नामित किया है। यह प्रतिष्ठित मान्यता 3 जून, 2024 से शुरू होने वाली चार साल की अवधि के लिए दी गई है।

हैदराबाद में 1956 में स्थापित, एनआईआईएमएच, आयुर्वेद, योग प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध, सोवा-रिग्पा, होम्योपैथी, बायोमेडिसिन और भारत में स्वास्थ्य देखभाल के अन्य संबंधित विषयों में औषधीय-ऐतिहासिक अनुसंधान का दस्तावेजीकरण और प्रदर्शन करने वाला एक अनूठा समर्पित संस्थान है। सीसीआरएएस के महानिदेशक, प्रो. वैद्य रविनारायण आचार्य के परिश्रमी नेतृत्व में, एनआईआईएमएच और डब्‍ल्‍यूएचओ -सीसी के प्रमुख ने निरंतर अवलोकन और समर्पण के माध्यम से यह उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है।

प्रो. आचार्य ने कहा, “डब्ल्यूएचओ द्वारा यह पदनाम एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जो पारंपरिक चिकित्सा और ऐतिहासिक अनुसंधान के क्षेत्र में हमारे अथक प्रयासों को दर्शाता है।” संस्थान आयुष की विभिन्न डिजिटल पहलों में अग्रणी रहा है, जिसमें अमर पोर्टल भी शामिल है, जो 16,000 आयुष पांडुलिपियों को सूचीबद्ध करता है, जिसमें 4,249 डिजिटाइज्ड पांडुलिपियां, 1,224 दुर्लभ पुस्तकें, 14,126 कैटलॉग और 4,114 पत्रिकाएँ शामिल हैं। एसएएचआई पोर्टल 793 चिकित्सा-ऐतिहासिक कलाकृतियों को प्रदर्शित करता है, जबकि आयुष परियोजना की ई-पुस्तकें क्‍लासिकल पाठ्यपुस्तकों के डिजिटल संस्करण प्रदान करती हैं। नमस्ते पोर्टल 168 अस्पतालों से संचयी रुग्णता आँकड़े एकत्र करता है, और आयुष अनुसंधान पोर्टल 42,818 प्रकाशित आयुष शोध लेखों को क्रमबद्ध करता है।

एनआईआईएमएच में 500 से अधिक पांडुलिपियाँ हैं, साथ ही मेडिकल हेरिटेज संग्रहालय और पुस्तकालय में 15वीं शताब्दी ईस्वी की दुर्लभ पुस्तकें और पांडुलिपियाँ हैं। संस्थान भारतीय चिकित्सा विरासत का जर्नल भी प्रकाशित करता है।

भारत में, बायोमेडिसिन और संबद्ध विज्ञान के विभिन्न विषयों में फैले लगभग 58 डब्ल्यूएचओ सहयोगी केन्‍द्र हैं। विशेषकर, सीसीआरएएस-एनआईआईएमएच, हैदराबाद, पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में आयुर्वेद शिक्षण और अनुसंधान संस्थान, जामनगर और मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान (एमडीएनआईवाई), नई दिल्ली के बाद डब्ल्यूएचओ सहयोगी केन्‍द्र के रूप में तीसरे रैंक में शामिल हो गया है।

“पारंपरिक चिकित्सा में मौलिक और साहित्यिक अनुसंधान” के लिए पहले डब्‍ल्‍यूएचओ सहयोगी केन्‍द्र के रूप में, एनआईआईएमएच को आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और सोवा-रिग्पा के लिए शब्दावली को मानकीकृत करने और अंतर्राष्ट्रीय रोग वर्गीकरण (आईसीडी-11) के ग्यारहवें संस्करण के लिए पारंपरिक चिकित्सा मॉड्यूल-II को अद्यतन करने में डब्‍ल्‍यूएचओ की सहायता करने का काम सौंपा गया है। इसके अतिरिक्त, डब्‍ल्‍यूएचओ सहयोगी केन्‍द्र पारंपरिक चिकित्सा के लिए अनुसंधान पद्धतियों को विकसित करने में सदस्य राज्यों का समर्थन करेगा।

यह निर्देश वैद्य राजेश कोटेचा, सचिव (आयुष), भारत सरकार के नेतृत्व और प्रयासों और डॉ. पवन गोदटवार, तकनीकी अधिकारी, डब्ल्यूएचओ-एसईएआरओ, नई दिल्ली और डॉ. प्रदीप कुमार दुआ, तकनीकी अधिकारी, टीएम यूनिट, डब्ल्यूएचओ मुख्यालय के तकनीकी मार्गदर्शन और समर्थन का प्रमाण है।

“पारंपरिक चिकित्सा में मौलिक और साहित्यिक अनुसंधान” के लिए डब्ल्यूएचओ सहयोगी केन्‍द्र का नेतृत्व सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रोफेसर वैद्य रबीनारायण आचार्य के साथ-साथ डॉ. जी. पी. प्रसाद, सहायक निदेशक प्रभारी और इकाई प्रमुख, वैद्य साकेत राम थ्रीगुल्ला, अनुसंधान अधिकारी (आयुर्वेद) और डॉ. संतोष माने, अनुसंधान अधिकारी (आयुर्वेद), एनआईआईएमएच, हैदराबाद सहित एक समर्पित टीम द्वारा सीसीआरएएस मुख्यालय की साहित्यिक और मौलिक अनुसंधान टीम के समन्वय में किया जाएगा।

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