नई दिल्ली: असम पेट्रो-केमिकल्स लिमिटेड (एपीएल) ने गुजरात के कांडला बंदरगाह पर 150 टन प्रति दिन (टीपीडी) की क्षमता वाला ई-मेथनॉल संयंत्र स्थापित करने के लिए दीनदयाल पोर्ट अथॉरिटी (डीपीए) के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए, जो भारत के स्वच्छ ऊर्जा और हरित परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आज असम के डिब्रूगढ़ स्थित मुख्यमंत्री सचिवालय में असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंता बिस्वा सरमा, केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल और अन्य गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया गया।
इस परियोजना में पूंजी के रूप में 1,200 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया जाएगा। इस परियोजना के परिणामस्वरूप लगभग 3,500 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित होंगे। केंद्रीय मंत्री ने दूरदर्शी परियोजना पर एक साथ आने के लिए डीपीए, कांडला और एपीएल को बधाई दी। केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा कि यह समझौता ज्ञापन इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत पर्यावरणीय जिम्मेदारी से समझौता किए बिना आर्थिक विकास को आगे बढ़ाएगा।
समझौते के तहत डीपीए बंदरगाह पर पाइपलाइन कनेक्टिविटी, भंडारण और ईंधन-हैंडलिंग से संबंधित बुनियादी ढांचा प्रदान करेगा। वहीं, एपीएल बंदरगाह क्षेत्र के भीतर हरित मेथनॉल उत्पादन सुविधा स्थापित करेगा, जिससे हरित समुद्री ईंधन के लिए एक एकीकृत मूल्य शृंखला का निर्माण होगा। ई-मेथनॉल या इलेक्ट्रो-मेथनॉल नवीकरणीय बिजली द्वारा संचालित हरित हाइड्रोजन और एकत्रित कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके उत्पादित किया जाता है। इसे शिपिंग, भारी उद्योग और रासायनिक विनिर्माण जैसे क्षेत्रों के लिए सबसे व्यवहार्य वैकल्पिक ईंधनों में से एक माना जाता है, जहां प्रत्यक्ष विद्युतीकरण अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा कि यह साझेदारी स्वच्छ ऊर्जा, हरित परिवहन और सतत आर्थिक विकास के लिए भारत के दीर्घकालिक दृष्टिकोण के अनुरूप एक रणनीतिक राष्ट्रीय पहल का प्रतिनिधित्व करती है। यह समझौता ज्ञापन केवल एक वाणिज्यिक साझेदारी का प्रतिनिधित्व नहीं करता है, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा, हरित शिपिंग और सतत आर्थिक विकास के लिए भारत के दीर्घकालिक दृष्टिकोण के अनुरूप एक रणनीतिक राष्ट्रीय पहल है। सर्बानंद सोनोवाल ने कहा कि यह परियोजना भारत के समुद्री कार्बन उत्सर्जन को कम करने के रोडमैप में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो हमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के 2070 तक कार्बन के शून्य उत्सर्जन (नेट जीरो) के विजन की ओर तेजी से बढ़ने में सक्षम बनाएगी।
एक बार चालू हो जाने के बाद इस सुविधा से कांडला बंदरगाह के अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्गों पर एक प्रमुख हरित ईंधन आपूर्ति केंद्र के रूप में उभरने की उम्मीद है, जिसमें सिंगापुर-रोटरडैम कॉरिडोर पर चलने वाले जहाज भी शामिल हैं। मंत्री ने कहा कि बंदरगाह आधारित ईंधन उत्पादन से कई फायदे मिलते हैं, जिनमें लॉजिस्टिक्स लागत में कमी, शिपिंग मांग के साथ सहज एकीकरण और ग्रीन बंकरिंग बुनियादी ढांचे का विकास शामिल है।
सर्बानंद सोनोवाल ने कहा कि समुद्री ईंधन के रूप में ई-मेथनॉल अंतरराष्ट्रीय उत्सर्जन नियमों को पूरा करता है और स्वच्छ लंबी दूरी की शिपिंग को सक्षम बनाता है। ई-मेथनॉल को बढ़ावा देकर भारत न केवल एक उपभोक्ता के रूप में बल्कि हरित समुद्री ईंधन के उत्पादक और आपूर्तिकर्ता के रूप में भी अपनी स्थिति सुदृढ़ कर रहा है। सोनोवाल ने कहा कि यह परियोजना वैश्विक स्थिरता मानकों के अनुरूप भविष्य के लिए तैयार हरित बंदरगाह के रूप में कांडला बंदरगाह की भूमिका को मजबूत करती है।
कार्बन उत्सर्जन कम करने के प्रयासों के तहत कांडला बंदरगाह को अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर चलने वाले जहाजों को कम और शून्य कार्बन वाले ईंधन की आपूर्ति के लिए एक ग्रीन बंकरिंग हब के रूप में विकसित किया जा रहा है। भारत के पश्चिमी तट पर स्थित गुजरात में कांडला बंदरगाह राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत ग्रीन हाइड्रोजन हब के रूप में विकसित किए जा रहे बंदरगाहों में से एक है। इस मिशन का लक्ष्य अगले 5 से 6 वर्षों में लगभग 5 मिलियन टन हरित हाइड्रोजन का उत्पादन और निर्यात करना है। यह पहल प्रधानमंत्री द्वारा उल्लिखित 2070 तक शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करने की भारत की प्रतिबद्धता में भी योगदान देती है।
सर्बानंद सोनोवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के गतिशील नेतृत्व में भारत का ऊर्जा परिवर्तन हरित अणुओं जैसे हरित हाइड्रोजन, हरित मेथनॉल, हरित अमोनिया और जैव-ऊर्जा द्वारा संचालित होगा, जो आने वाले दशकों में हमारे उद्योगों, परिवहन व्यवस्था और समुद्री क्षेत्र को शक्ति प्रदान करेगा।
एक बार चालू हो जाने के बाद इस संयंत्र से कांडला बंदरगाह की ओर अधिक गहरे समुद्र में चलने वाले जहाजों को आकर्षित करने, माल ढुलाई बढ़ाने और भीतरी इलाकों और पूरे देश में व्यापार वृद्धि को समर्थन देने की उम्मीद है। सोनोवाल ने दशकों के परिचालन अनुभव के साथ भारत के प्रमुख मेथनॉल उत्पादकों में से एक एपीएल की भूमिका की सराहना की।
सर्बानंद सोनोवाल ने कहा कि यह सहयोग भारत की स्वच्छ ऊर्जा यात्रा में असम के बढ़ते योगदान को दर्शाता है और यह प्रदर्शित करता है कि कैसे उत्तर पूर्वी क्षेत्र राष्ट्रीय मूल्य शृंखलाओं में एक अभिन्न भागीदार बन रहा है। इससे भारत के ऊर्जा परिवर्तन में असम की भूमिका मजबूत होगी, मेथनॉल अर्थव्यवस्था पहल को समर्थन मिलेगा और आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि यह सहयोग सरकार के आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया और मेक फॉर द वर्ल्ड के लक्ष्यों का समर्थन करता है साथ ही भारत को समुद्री उत्सर्जन कम करने में वैश्विक लीडर के रूप में स्थापित करता है।
असम स्थित एपीएल नामरूप देश की सबसे बड़ी मेथनॉल सुविधाओं में से एक का संचालन करती है और इसने हाल ही में अपनी उत्पादन क्षमता का विस्तार किया है। डीपीए और कांडला के साथ साझेदारी से कंपनी को पारंपरिक मेथनॉल से हरित और ई-मेथनॉल उत्पादन की ओर मूल्य शृंखला में आगे बढ़ने में मदद मिलने की उम्मीद है।
इस मौके पर असम सरकार के उद्योग, वाणिज्य और सार्वजनिक उद्यम एवं सांस्कृतिक मामलों के विभाग के मंत्री बिमल बोराह, असम सरकार के विद्युत, कौशल, रोजगार एवं उद्यमिता एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री प्रशांत फुकन; राज्यसभा सांसद रामेश्वर तेली और पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री व नाहरकटिया के विधायक तरंगा गोगोई भी उपस्थित थे। इस समझौता ज्ञापन पर असम पेट्रो-केमिकल्स लिमिटेड (एपीएल) के अध्यक्ष बिकुल डेका और दीनदयाल पोर्ट अथॉरिटी (डीपीए) के अध्यक्ष सुशील कुमार सिंह ने हस्ताक्षर किए, जबकि सार्वजनिक कल्याण मंत्रालय के निदेशक मनदीप सिंह रंधावा भी समारोह में मौजूद रहे।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दृष्टिकोण के अनुरूप, पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय (एमओपीएसडब्ल्यू) ने हरित सागर-ग्रीन पोर्ट दिशानिर्देश, बंदरगाहों पर नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना, वैकल्पिक समुद्री ईंधन को प्रोत्साहित करना और बंदरगाहों को ऊर्जा और औद्योगिक केंद्रों के रूप में विकसित करने सहित कई उपक्रम शुरू किए हैं। भारत की अर्थव्यवस्था में शिपिंग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि मात्रा के हिसाब से भारत का लगभग 90% व्यापार बंदरगाहों के माध्यम से होता है, जिससे राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बंदरगाहों और शिपिंग का कार्बन उत्सर्जन कम करना आवश्यक हो जाता है।
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