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बीएसएनएल का राजस्व ₹21,000 करोड़ से बढ़कर ₹25,000 करोड़ हो गया

भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) अब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अपनी शानदार वापसी की कहानी लिख रहा है; और महज दो सालों में ही यह डिजिटल समावेश और राष्ट्रीय विकास का एक अहम जरिया बनकर उभरा है। डॉ. चंद्र शेखर पेम्मासानी ने इस बदलाव को चुनौतीपूर्ण होने के साथ-साथ बेहद संतोषजनक भी बताया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि काम करने के तौर-तरीकों, टावरों की हालत और पुराने पड़ चुके इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी समस्याओं को ठीक करने से ही यह बदलाव संभव हो पाया है।

डॉ. पेम्मासानी ने आगे कहा, “हमने बीएसएनएल को फिर से खड़ा करने के काम को पूरी योजनाबद्ध तरीके से और निजी क्षेत्र जैसे अनुशासन के साथ किया। मजबूत आर्थिक स्थिति, स्वदेशी तकनीक और भारत के सबसे दूरदराज के इलाकों तक कनेक्टिविटी का पहुंचना जैसे इसके नतीजे अब साफ दिख रहे हैं।”

बीएसएनएल के विकास की कहानी बताते हुए राज्य मंत्री ने कहा कि इसका आर्थिक कायाकल्प वाकई काबिले-तारीफ है। बीएसएनएल का राजस्व ₹21,000 करोड़ से बढ़कर ₹25,000 करोड़ हो गया है, जो कि दो सालों में 20–25% की एक अच्छी-खासी बढ़ोतरी है। इससे भी ज्यादा अहम बात यह है कि एबिट्डा महज ₹50 करोड़ से बढ़कर लगभग ₹7,000 करोड़ तक पहुंच गया है, जो बेहतर परिचालन क्षमता और मुनाफे की ओर एक साफ रास्ते को दिखाता है।

डॉ. पेम्मासानी ने इस सफलता के पीछे की व्यवस्थित कार्यप्रणाली के बारे में बताया। डॉ. पेम्मासानी ने कहा कि आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में, टावर अपटाइम (चालू रहने का समय) केवल 75% था। हमने 95% का लक्ष्य निर्धारित किया, 50,000 टावरों पर 50,000 बैटरियां बदलीं, पावर प्लांट को अपग्रेड किया और पुरानी हो चुकी केबलों को बदला। इसके बाद हमने एंटरप्राइज बिजनेस और नए मोबाइल कनेक्शन के लिए हर सर्कल और राज्य स्तर पर व्यवस्थित लक्ष्य निर्धारित किए। इस प्रयास में नियमित निगरानी और जवाबदेही मुख्य आधार रहे हैं।

एक गर्व का विषय स्वदेशी 4जी तकनीक का तेजी से विस्तार रहा है। डॉ. पेम्मासानी ने कहा, “हमने एक ही साल के भीतर 1,00,000 टावरों पर स्वदेशी 4जी सेवा शुरू की और अब इसे लगभग वैश्विक मानकों के अनुरूप बना लिया है। भारत अब दुनिया का केवल पांचवां ऐसा देश है जिसने इतनी उन्नत स्वदेशी 4जी तकनीक विकसित की है।”

लोगों का भरोसा फिर से जीतने के अहम मुद्दे पर, मंत्री का रवैया व्यावहारिक होने के साथ-साथ आशावादी भी था। उन्होंने कहा, “हम जानते हैं कि भरोसा रातों-रात वापस नहीं आ सकता। हमारे टैरिफ निजी कंपनियों के मुकाबले कहीं ज्यादा सस्ते हैं। हम भारतीय डाक कार्यालयों के जरिए एक रुपये वाले सिम कार्ड दे रहे हैं, ताकि लोग हमारी सेवा आजमा सकें। हम भारतीय डाक के साथ मिलकर ग्रामीण इलाकों में घर-घर जाकर जागरूकता फैलाने पर भी काम कर रहे हैं, जहां डाक कर्मचारी बीएसएनएल की बेहतर सेवाओं के बारे में लोगों को विस्तार से बताते हैं। जिन गांवों में बीएसएनएल ही एकमात्र भरोसेमंद विकल्प है, वहां लोगों को निश्चित रूप से इसकी सेवा लेनी चाहिए।”

डॉ. पेम्मासानी ने बताया कि इसका सबसे ज्यादा असर दूरदराज और आदिवासी इलाकों में देखने को मिला है। करीब 35,000 गांवों में पहले तकनीकी-व्यावसायिक चुनौतियों, मुश्किल इलाकों या वामपंथी उग्रवाद की वजह से ठीक कनेक्टिविटी नहीं थी। “प्रधानमंत्री मोदी जी का सपना है कि हर गांव को जोड़ा जाए, चाहे वह कितना भी दूर क्यों न हो। हम हर हफ्ते काम की प्रगति पर नजर रखते हैं। हमने इन गांवों को कवर करने के लिए अब तक करीब 25,000 टावर लगा दिए हैं और 10,000 टावर लगाने का काम अभी चल रहा है।”

उन्होंने बताया कि कैसे कनेक्टिविटी सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता में योगदान दे रही है। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जैसे इलाकों में, बीएसएनएल के टावरों की वजह से लोग पुलिस और अधिकारियों से जल्दी संपर्क कर पा रहे हैं। यह सशक्तिकरण वामपंथी उग्रवाद को कम करने में मदद कर रहा है। एक बार जब इन इलाकों में कनेक्टिविटी पहुंच जाती है, तो विकास भी पहुंचता है और उग्रवाद खत्म हो जाता है।

बीएसएनएल के प्रयासों को भारतनेट की महत्वाकांक्षी परियोजना से और भी बल मिल रहा है। डॉ. पेम्मासानी ने कहा, “हम हर ग्राम पंचायत तक हाई-स्पीड फाइबर पहुंचाने के लिए लगभग ₹1,40,000 करोड़ का निवेश कर रहे हैं। भारतनेट 1 और 2 की कमियों से सीखते हुए, हमने उन समस्याओं को ठीक कर लिया है और अब पूरी जवाबदेही के साथ काम कर रहे हैं। अभी केवल 15 लाख ग्रामीण परिवार ही जुड़े हुए हैं। पहले चरण में हमारा लक्ष्य 1.5 करोड़ परिवारों तक पहुंचना है।” उन्होंने आगे बताया कि गांव-स्तर के उद्यमियों को ‘लास्ट-माइल’ (अंतिम छोर तक) उपयोग का विस्तार करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

डॉ. पेम्मासानी ने इस बात पर जोर दिया, “संचार ढांचा, 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनाने के प्रधानमंत्री मोदी के विजन का मुख्य आधार है। यह केवल टावरों और केबलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक संस्थानों की सोच और कार्य-संस्कृति में बदलाव लाने के बारे में है।”

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