देश आज राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है। इसके उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नई दिल्ली में एक वर्ष तक चलने वाले स्मरण कार्यक्रम का उद्घाटन करेंगे। इस अवसर पर वे एक डाक टिकट और सिक्का भी जारी करेंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में कहा था कि यदि देशभक्ति शब्द से परे एक भावना है, तो वंदे मातरम गीत उस भावना को मूर्त रूप देता है।
150 वर्ष पूर्व वंदे मातरम की रचना हुई थी। वंदे मातरम के गान में करोड़ो देशवासियों ने हमेशा राष्ट्रप्रेम के आपार उफान को महसूस किया है। वंदे मातरम हमारे इन प्रयासो में हमेशा हमारी प्रेरणा बनेगा।
वन्दे मातरम एक ऐसा गीत है जिसने कई पीढ़ियों को एकजुट होने, आगे बढ़ने और राष्ट्र की भावना का जश्न मनाने के लिए प्रेरित किया है।
प्रसिद्ध बांग्ला कवि और उपन्यासकार बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित, वंदे मातरम भारत की जागृति का प्रतीक है। समय के साथ, यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों के लिए विदेशी सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध का नारा बन गया। वंदे मातरम को बैठकों, जुलूसों और सार्वजनिक सभाओं में एक प्रेरणादायक गीत के रूप में गाया जाने लगा। वर्ष 1882 में बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास आनंद मठ में यह गीत प्रकाशित हुआ। गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने वर्ष 1896 में कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वार्षिक बैठक में वंदे मातरम का पाठ किया था। इसने सदियों की गुलामी से कमजोर भारत में नई जान फूंक दी। 24 जनवरी 1950 को भारत की संविधान सभा द्वारा आधिकारिक रूप से राष्ट्रगीत के रूप में अपनाए जाने के बाद, संविधान सभा के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम को राष्ट्रगान जन गण मन के समान ही सम्मान देने ही घोषणा की।
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