नीति आयोग ने आज “योजनाओं के अभिसरण के माध्यम से एमएसएमई क्षेत्र में दक्षता प्राप्त करना” शीर्षक से एक बृहद रिपोर्ट जारी की , जिसमें भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए सरकारी सहायता की प्रभावशीलता को मजबूत करने हेतु एक रणनीतिक रोडमैप की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है। इस रिपोर्ट का विमोचन नीति आयोग के सदस्य डॉ. अरविंद विरमानी और नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बीवीआर सुब्रह्मण्यम ने किया।
यह रिपोर्ट योजनाओं के कार्यान्वयन को सुव्यवस्थित करके, अंतर-मंत्रालयी समन्वय को मजबूत करके और वित्तीय, कौशल, विपणन और नवाचार सहायता के वितरण को बढ़ाकर लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए बेहतर परिणाम प्राप्त करने हेतु एक विस्तृत खाका प्रस्तुत करती है। यह एमएसएमई क्षेत्र के लिए भारत सरकार की मौजूदा योजनाओं और कार्यक्रमों का मूल्यांकन करती है, उनके बीच वर्तमान अभिसरण स्तर का आकलन करती है और केंद्र, राज्य और अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों से सर्वोत्तम प्रथाओं की पहचान करती है। इस आकलन के आधार पर, रिपोर्ट अभिसरण के अवसरों को खोलने और एमएसएमई योजनाओं की दक्षता, पहुंच और प्रभाव को बेहतर बनाने के लिए सुधारात्मक उपाय करने हेतु व्यावहारिक सिफारिशें प्रस्तुत करती है।
अभिसरण की आवश्यकता
लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय वर्तमान में ऋण सहायता, कौशल विकास, विपणन सहायता, नवाचार एवं अनुसंधान एवं विकास, प्रौद्योगिकी एवं गुणवत्ता उन्नयन तथा अवसंरचना विकास जैसे महत्वपूर्ण सहायता क्षेत्रों को कवर करने वाली 18 योजनाओं का संचालन करता है। यद्यपि इन पहलों ने लघु एवं मध्यम उद्यम विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन विभिन्न मंत्रालयों में उद्देश्यों को दोहराने और निषफलता के कारण अक्सर दोहराव, अक्षमताएं और सीमित पहुंच जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि योजनाओं का प्रभावी समन्वय और युक्तिकरण लाभार्थियों के लिए पहुंच को आसान बनाकर संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित कर सकता है और साथ ही दोहराव एवं गड़बड़ी को कम करके समग्र प्रभाव में वृद्धि कर सकता है।
अभिसरण के लिए संरचना
रिपोर्ट में अभिसरण के लिए दोहरे दृष्टिकोण की सिफारिश की गई है , जिसमें सूचना अभिसरण और प्रक्रिया अभिसरण शामिल हैं।
मुख्य सिफारिशें
रिपोर्ट में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति केंद्र और उत्तर पूर्वी क्षेत्र (एनईआर) में लघु एवं मध्यम उद्यमों को बढ़ावा देने जैसी लक्षित पहलों की सुरक्षा के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया है। पीएमईजीपी और पीएम विश्वकर्मा जैसे बड़े प्रमुख कार्यक्रमों को उनके व्यापक स्वरूप और रणनीतिक आर्थिक महत्व को देखते हुए स्वतंत्र बनाए रखने की सिफारिश की गई है।
संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने और प्रशासनिक अनावश्यकताओं को कम करने के लिए, रिपोर्ट सावधानीपूर्वक अभिसरण की योजनाओं का समर्थन करती है , जिसमें लक्षित कार्यक्रमों के विशिष्ट फोकस को बनाए रखते हुए, एक समान उद्देश्यों वाली योजनाओं का विलय किया जाता है। जहां पूर्ण विलय संभव नहीं है, वहां प्रशासकों के लिए संयुक्त कार्यशालाओं और साझा क्षमता-निर्माण के माध्यम से बेहतर सहयोग की अनुशंसा की जाती है। अभिसरण प्रक्रिया के दौरान, रिपोर्ट लाभार्थियों के हितों की रक्षा करने, परिवर्तनों का सावधानीपूर्वक प्रबंधन करने और सतत प्रभाव सुनिश्चित करने के लिए परिणामों पर कड़ी निगरानी रखने की आवश्यकता पर बल देती है।
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