राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज बिहार के राजगीर में नालंदा विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भाग लिया और छात्रों को संबोधित भी किया।
राष्ट्रपति ने इस अवसर पर कहा कि आज का दीक्षांत समारोह एक सभ्यतागत वादे की पुष्टि है: एक वादा कि ज्ञान कायम रहेगा, संवाद प्रबल रहेगा और शिक्षा मानवता की सेवा करती रहेगी। उन्होंने स्नातक छात्रों को बधाई दी और कहा कि उनकी उपलब्धियां दृढ़ता, अनुशासन और बौद्धिक प्रतिबद्धता का परिणाम हैं। उन्होंने यह जानकर प्रसन्नता व्यक्त की कि आज स्नातक होने वाले छात्रों में से आधे से अधिक 30 से अधिक देशों के अंतर्राष्ट्रीय छात्र हैं।
राष्ट्रपति ने कहा कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय लगभग आठ शताब्दियों तक ज्ञान के एक प्रतिष्ठित केंद्र के रूप में स्थापित रहा। नालंदा का पतन न केवल भारत के लिए बल्कि पूरे विश्व के लिए एक बहुत बड़ी क्षति थी। फिर भी, नालंदा की अवधारणा जीवित रही। हमारे समय में इसका पुनरुत्थान आधुनिक संदर्भ में उस गौरवशाली विरासत को पुनः स्थापित करने की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धता का प्रतीक है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि यह पुनरुत्थान दूरदर्शी नेतृत्व, निरंतर संस्थागत प्रयासों और सहयोगी देशों के समन्वय के माध्यम से संभव हुआ है। यह इस बात का उदाहरण है कि कैसे विविध राष्ट्र साझा मूल्यों द्वारा निर्देशित होकर उच्च लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं।
राष्ट्रपति ने कहा कि प्राचीन नालंदा ने विविध विचारधाराओं का स्वागत किया और वाद-विवाद एवं संवाद की संस्कृति को बढ़ावा दिया। यहां ज्ञान को कभी भी पृथक रूप में नहीं देखा गया, बल्कि यह नैतिकता, समाज और मानवता के व्यापक कल्याण से अभिन्न रूप से जुड़ा रहा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह आदर्श आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। ऐसे समय में जब विश्व अनेक जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है, करुणा पर आधारित स्वतंत्र और आलोचनात्मक चिंतन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि नालंदा विश्वविद्यालय एशिया और विश्व भर में एक अग्रणी शैक्षणिक संस्थान के रूप में उभरेगा। यह न केवल अपनी अकादमिक उत्कृष्टता बल्कि अपने मूल्यों से भी एक विशिष्ट पहचान बनाएगा।
राष्ट्रपति ने कहा कि भारत का बौद्ध दर्शन और बौद्ध अभ्यास से गहरा और जीवंत संबंध है। इस संबंध को गंभीरतापूर्वक और भारत की शास्त्रीय ज्ञान परंपराओं की व्यापक समझ के साथ पोषित किया जाना चाहिए। बौद्ध विद्वत्ता को एशिया भर में इसकी विविध अभिव्यक्तियों से जुड़ते हुए भारत की सभ्यतागत नींव में निहित रहना चाहिए। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि नालंदा विश्वविद्यालय बौद्ध अध्ययन के लिए एक अग्रणी वैश्विक केंद्र के रूप में उभर सकता है। उन्होंने विश्वविद्यालय से इस क्षेत्र में दृढ़ संकल्प, गहनता और खुलेपन के साथ निवेश करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि ऐसा करके नालंदा विश्वविद्यालय एक बार फिर सदियों पुरानी भूमिका में आ जाएगा।
राष्ट्रपति ने कहा कि प्राचीन नालंदा के पुस्तकालय में लाखों पांडुलिपियां थीं। उस उत्कृष्ट उदाहरण को ध्यान में रखते हुए, आज हम यहां जो निर्माण कर रहे हैं, वह एक अमिट विरासत बनेगा। भारत 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है, ऐसे में नालंदा विश्वविद्यालय जैसे संस्थान महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
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